शोर का खेल खत्म करने आया 3डी प्रिंटेड सोनिक ब्लैक होल, बंद पाइप में आवाज छोड़ते ही अंदर हो जाएगी दफन

Sonic Black Hole: आवाज हमारे चारों तरफ मौजूद हर सतह से टकराकर गूंजती है. यह गूंज कई मौकों पर बेहद काम की साबित होती है, लेकिन कई बार यह सिरदर्द बन जाती है. खासकर बंद पाइपों और वेंटिलेशन सिस्टम में यह आवाज किसी भयानक शोर में बदल जाती है. स्पेन की यूनिवर्सिटैट रेमन लुल के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक हैरतअंगेज हल खोज निकाला है. उन्होंने लैब में एक ऐसा सोनिक ब्लैक होल तैयार किया है, जो आवाज को पूरी तरह निगल जाता है. यह डिवाइस 3डी प्रिंटेड है और इसे सीधे किसी भी चालू पाइप में लगाया जा सकता है.

पाइपों में टकराकर गूंजने वाली आवाज आखिर कैसे बन जाती है मुसीबत?

आवाज जब भी किसी खाली और बंद जगह में चलती है, तो उसका बर्ताव बदल जाता है. रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गूंज रोकने के लिए तो फोम की दीवारें लगा दी जाती हैं. घरों और फैक्ट्रियों के पाइपों में ऐसा करना बिल्कुल मुमकिन नहीं होता है.

एयर कंडीशनिंग के डक्ट्स, वेंटिलेशन पाइप और ड्रेनेज सिस्टम हर जगह फैले हुए हैं. जब हवा या लिक्विड इन बंद पाइपों से गुजरता है, तो भारी साउंड पैदा होता है. यह आवाज पाइप के मुहाने या बंद किनारों से बार-बार टकराती है.

किनारों से टकराने के बाद आवाज अंदर ही गोल-गोल घूमने लगती है. इससे एक ऐसा वाइब्रेशन पैदा होता है, जो पूरे ढांचे को हिला देता है. यह कंपन मशीनों को नुकसान पहुंचाता है और इंसानों के लिए चिड़चिड़ाहट की वजह बनता है.

साउंड इंजीनियर ओरिओल गुआश ने कहा, ‘अगर आप किसी बंद पाइप के सामने खड़े होकर जोर से चिल्लाएंगे, तो कुछ पलों बाद आपको अपनी ही आवाज की तेज गूंज वापस सुनाई देगी.’

पारंपरिक तौर पर इस शोर को रोकने के लिए भारी-भरकम साइलेंसर लगाए जाते थे. वे साइलेंसर काफी महंगे होते थे और पाइप के भीतर बहुत ज्यादा जगह घेर लेते थे. इसी वजह से वैज्ञानिक एक हल्के और असरदार समाधान की तलाश में जुटे थे.

अंतरिक्ष के ब्लैक होल जैसा बर्ताव कैसे करने लगती हैं साउंड वेव्स?

स्पेस में मौजूद ब्लैक होल अपने जबर्दस्त ग्रैविटी खिंचाव के लिए जाने जाते हैं. उनके पास से रोशनी भी बचकर बाहर नहीं निकल सकती है. भौतिकी के नियमों के मुताबिक, उनका घनत्व इतना ज्यादा होता है कि स्पेस और टाइम मुड़ जाते हैं.

वैज्ञानिकों ने लैब में ग्रैविटी वाला ब्लैक होल नहीं बनाया है. उन्होंने साउंड वेव्स के खास नेचर का इस्तेमाल करके वैसा ही माहौल तैयार किया है. सही बनावट मिलने पर आवाज की तरंगे लगातार धीमी होती चली जाती हैं.

यह स्थिति प्राचीन दार्शनिक जेनो के मशहूर पैराडॉक्स जैसी दिखाई देती है. उस सिद्धांत में मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचने के लिए हर बार बची हुई आधी दूरी तय करनी होती है. वह आधी-आधी दूरी कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती है.

इस सोनिक ब्लैक होल में आवाज की तरंग असलियत में धीमी होती है. जैसे-जैसे साउंड वेव डिवाइस के संकरे हिस्से की तरफ बढ़ती है, उसकी चाल लगातार घटती जाती है. बाहरी देखने वाले को लगता है कि तरंग कभी आखिरी सिरे तक पहुंच ही नहीं पाएगी.

ओरिओल गुआश ने कहा, ‘एक आदर्श सोनिक ब्लैक होल में जब कोई साउंड वेव दाखिल होती है, तो वह कभी भी पलटकर बाहर नहीं आती है.’

साउंड वेव इस चक्रव्यूह में फंसकर अपनी पूरी ताकत खो देती है. बाहर खड़े किसी भी इंसान को पाइप के सिरे से कोई गूंज सुनाई नहीं देती है. ऐसा महसूस होता है जैसे पाइप कभी खत्म ही नहीं हो रहा है.

बंद पाइप में चिल्लाने पर भी वापस नहीं लौटेगी आवाज, स्पेन के वैज्ञानिकों ने तैयार किया सोनिक ब्लैक होल मॉडल. (वीडियो : एआई जेनेरेटेड)

नए सोनिक ब्लैक होल का डिजाइन पुराने मॉडल्स से किस तरह एकदम अलग है?

  • वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह कोई जादुई छेद नहीं है. यह इंजीनियरिंग का एक बेहद सटीक और नपा-तुला स्ट्रक्चर है. यह पाइप के भीतर आवाज के चलने के रास्ते को पूरी तरह बदल देता है.
  • पुराने डिजाइनों में पाइप की अंदरूनी दीवारों पर कई रिंग्स और खांचे बनाए जाते थे. उन खांचों से गुजरते हुए आवाज धीरे-धीरे धीमी पड़ती थी. उसकी वेवलेंथ छोटी होती जाती थी और पूरी एनर्जी एक जगह सिमट जाती थी.
  • पुराने मॉडल में सबसे बड़ी खामी यह थी कि उसे अलग से लगाना नामुमकिन था. इसके लिए पूरा पाइप ही फैक्ट्री में नए सिरे से तैयार करना पड़ता था. पुराने लगे हुए सिस्टम में उसे फिट करना लगभग नामुमकिन काम था.
  • पुराने सिस्टम सिर्फ कुछ सीमित साउंड फ्रीक्वेंसी पर ही काम करते थे. इंजीनियर जी डेंग और उनकी टीम ने इस पूरे स्ट्रक्चर को उलट दिया. उन्होंने पाइप की दीवार पर काम करने के बजाय बीच में लगने वाला सिस्टम सोचा.
  • टीम ने इसे अंदर से बाहर की तरफ डिजाइन किया. इसे देखने पर यह किसी सोनिक क्रिसमस ट्री जैसा नजर आता है. इसे पाइप के भीतर एक प्लग की तरह आसानी से डाला जा सकता है.
  • ओरिओल गुआश ने कहा, ‘यह कॉन्सेप्ट बेहद आसान है और बहुत शानदार तरीके से काम करता है. इसे डक्ट से अलग बनाकर सीधे अंदर फिट किया जा सकता है.’

लैब के इंपीडेंस ट्यूब में वैज्ञानिकों ने इस डिवाइस की टेस्टिंग कैसे की?

रिसर्चर्स ने अपने इस नए आइडिया को परखने के लिए 3डी प्रिंटर का सहारा लिया. उन्होंने 15 सेंटीमीटर लंबा एक प्रोटोटाइप तैयार किया. इस पूरे स्ट्रक्चर के सेंटर में एक मजबूत रॉड दी गई थी.

इस सेंट्रल रॉड पर कुल 29 गोल रिंग्स सेट की गई थीं. इन रिंग्स का डायमीटर एक सिरे से दूसरे सिरे की ओर धीरे-धीरे घटता जा रहा था. दो रिंग्स के बीच की खाली जगह ने छोटे-छोटे कैविटीज का रूप ले लिया था.

इस तैयार मॉडल को वैज्ञानिकों ने एक इंपीडेंस ट्यूब में फिट किया. यह लैब का एक खास उपकरण होता है, जो साउंड वेव्स के बर्ताव को नापता है. इसके जरिए जाना जाता है कि कोई चीज आवाज को कितना रोक पाती है.

वैज्ञानिकों ने ट्यूब के एक सिरे पर पावरफुल स्पीकर लगाया. इस स्पीकर की मदद से अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की आवाजें ट्यूब के अंदर भेजी गईं. दूसरी तरफ संवेदनशील माइक्रोफोन लगाए गए थे, ताकि लौटने वाली गूंज को रिकॉर्ड किया जा सके.

एक्सपेरिमेंट का सेटअप (बाईं ओर) और 3D-प्रिंटेड सोनिक ब्लैक होल (दाईं ओर), जिसमें एक सेंट्रल सपोर्ट रॉड पर लगी रिंग्स दिखाई दे रही हैं. यह पता लगाने के लिए कि यह कितनी आवाज रिफ्लेक्ट करता है, इस डिवाइस को एक इम्पीडेंस ट्यूब में डाला गया. (Deng et al., Applied Acoustics, 2026)

टेस्ट के नतीजे ठीक वैसे ही आए, जैसे कंप्यूटर सिमुलेशन में देखे गए थे. सोनिक ब्लैक होल से टकराने के बाद आवाज की वापसी लगभग न के बराबर दर्ज की गई. डिवाइस ने आवाज के बड़े हिस्से को अपने भीतर ही रोक लिया था.

यह सोनिक क्रिसमस ट्री आवाज को फ्रिक्शन और हीट में कैसे बदल देता है?

  1. आवाज असल में हवा के मॉलिक्यूल्स का एक वाइब्रेशन होती है. जब यह वाइब्रेशन सोनिक ब्लैक होल की नोक में घुसता है, तो रिंग्स का ढांचा उसकी चाल घटा देता है. उसकी वेवलेंथ लगातार छोटी होने लगती है.
  2. जैसे-जैसे साउंड वेव संकरे हिस्से की तरफ बढ़ती है, उसकी एनर्जी बहुत घनी हो जाती है. आम पाइप में यह एनर्जी दीवार से टकराकर बाहर की तरफ भागती है. इसी वजह से हमको तेज आवाज की गूंज सुनाई देती है.
  3. इस नए डिवाइस में आवाज बाहर भागने के बजाय अंदरूनी सतहों से रगड़ खाती है. हवा और प्लास्टिक रिंग्स के बीच जबर्दस्त फ्रिक्शन पैदा होता है. इस घर्षण की वजह से साउंड एनर्जी पूरी तरह बिखरने लगती है.
  4. यह फ्रिक्शन साउंड को हल्की सी थर्मल एनर्जी यानी हीट में बदल देता है. यह हीट इतनी मामूली होती है कि उसे छूकर महसूस नहीं किया जा सकता है. इस बदलाव की वजह से आवाज की ताकत हमेशा के लिए खत्म हो जाती है.
  5. कंप्यूटर सिमुलेशन में यह भी पाया गया कि यह डिजाइन पुराने मॉडल्स से कहीं ज्यादा फ्रीक्वेंसी पर काम करता है. रिंग्स के बीच की खाली जगहें हाई फ्रीक्वेंसी पर रेजोनेट होती हैं. इस वजह से यह डिवाइस कई तरह के तीखे और भारी शोर को आसानी से सोख लेता है.

फैक्ट्री से लेकर घरों तक इस नई तकनीक से क्या बदलाव देखने को मिलेंगे?

इस खोज का सबसे पहला और सीधा फायदा नॉइज कंट्रोल इंडस्ट्री को मिलने वाला है. आज के दौर में बड़ी फैक्ट्रियों के एग्जॉस्ट और ब्लोअर बेहद तेज आवाज करते हैं. वहां काम करने वाले मजदूरों की सुनने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है.

इस 3डी प्रिंटेड डिवाइस को बिना किसी तोड़फोड़ के पुराने पाइपों में डाला जा सकेगा. इससे कंपनियों का भारी खर्च बचेगा और काम करने की जगह शांत बनेगी. हॉस्पिटल्स के वेंटिलेशन सिस्टम में भी इसका इस्तेमाल बहुत राहत देगा.

हवाई जहाजों के इंजनों और कारों के एग्जॉस्ट में भी इस तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है. अगर साइलेंसर का वजन कम हो जाए, तो गाड़ियां कम फ्यूल खर्च करेंगी. यह पर्यावरण के लिहाज से भी एक बड़ा कदम साबित होगा.

साइंटिस्ट्स अब इस तकनीक को सिर्फ पाइपों तक सीमित नहीं रखना चाहते हैं. वे इसे 2डी और 3डी स्ट्रक्चर में ढालने की प्लानिंग कर रहे हैं. अगर ऐसा हुआ, तो कमरों की दीवारों और सीलिंग पर इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा.

आर्किटेक्चर के फील्ड में यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है. बिना मोटे और भारी फोम लगाए बड़े ऑडिटोरियम को पूरी तरह साउंडप्रूफ बनाया जा सकेगा. घरों के अंदर बाहर से आने वाला ट्रैफिक का शोर भी रोका जा सकेगा.

रियल वर्ल्ड में इस डिवाइस को तैनात करने के रास्ते में कौन सी चुनौतियां हैं?

लैब का शांत और नियंत्रित माहौल असल दुनिया से काफी अलग होता है. रिसर्च टीम अच्छी तरह जानती है कि इसे मार्केट में उतारने से पहले कई बाधाएं पार करनी होंगी. सबसे बड़ी समस्या धूल और कचरे की है.

फैक्ट्रियों और एग्जॉस्ट पाइपों में भारी मात्रा में धुंआ और धूल उड़ती है. अगर धूल के कण इन 29 रिंग्स के बीच जमा हो गए, तो कैविटीज बंद हो जाएंगी. कैविटीज बंद होते ही इस डिवाइस का एकॉस्टिक असर खत्म हो जाएगा.

दूसरी बड़ी चुनौती तापमान और हवा के तेज दबाव की है. इंडस्ट्रियल पाइपों में गर्म गैसें बहुत तेज बहाव के साथ आगे बढ़ती हैं. डिवाइस को ऐसे मटीरियल से बनाना होगा, जो बिना पिघले तेज हवा का दबाव झेल सके.

वैज्ञानिकों को अब ऐसे मजबूत मटीरियल तलाशने होंगे, जो लंबे समय तक टिक सकें. साथ ही ऐसी तकनीक भी सोचनी होगी, जिससे यह डिवाइस खुद को साफ रख सके. इन दिक्कतों को सुलझाने के लिए आगे के ट्रायल्स तेजी से चल रहे हैं.

ओरिओल गुआश ने कहा, ‘मेरे लिए सबसे ज्यादा रोमांचक बात इसके पीछे की फिजिक्स और मैथमैटिक्स है. कुछ साल पहले तक इस तरह से वेव्स को कंट्रोल करना साइंस फिक्शन जैसा लगता था.’

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