नई दिल्ली: दवाइयों की वास्तविक कीमत और उन पर छपी एमआरपी में भारी अंतर है. News18India की ग्राउंड रिपोर्ट में चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है. दिल्ली स्टेट कैंसर हॉस्पिटल के सामने एक रिटेल केमिस्ट ने दवाइयों के दाम के गणित का खुलासा करते हुए बताया कि कंपनी जो दवाई बनाती है, उस पर भले ही एमआरपी 1000 रुपए छपी हो, लेकिन वह बाजार में 100 रुपए में बेची जाती है. दुकानदार का कहना है कि उनके यहां एमआरपी पर कोई दवाई नहीं बेची जाती है और अगर किसी दवाई पर जरूरत से ज्यादा एमआरपी छपी है या वह महंगी बेची जा रही है, तो इसके पीछे की वजह खुद दवा बनाने वाली कंपनी ही बता पाएगी. केमिस्ट ने बताया कि वे थोक बाजार से 20 परसेंट पर दवाइयां खरीदते हैं. नर्सिंग होम में जो दवाइयां सप्लाई होती हैं, उन पर छपा प्रिंट रेट अलग होता है और जब वही प्रिंट खुले बाजार में आता है, तो केमिस्ट उस पर मात्र 10 परसेंट अपना मार्जिन लेकर आगे बेच देते हैं.
दुकानदार ने सबूत के तौर पर News18India को एक दवाई की एमआरपी दिखाते हुए बताया कि इस पर 14000 रुपए एमआरपी छपी है, जिसे वे थोक में 1550 रुपए में खरीदते हैं और ग्राहक को 1700 रुपए में बेचते हैं. इसी तरह 445 रुपए की एमआरपी वाली एक दूसरी दवाई दिखाते हुए उसने बताया कि इसे वे 150 रुपए में खरीदते हैं और यह ग्राहक को 200 रुपए में बिकती है.
ग्राहक और अन्य मेडिकल स्टोर संचालकों ने दवाओं की कीमत पर क्या खुलासा किया?
- मेडिकल स्टोर पर दवाई खरीदने आई एक महिला ने आम आदमी की मजबूरी बयां करते हुए कहा कि बाजार में दवाइयां तो महंगी ही मिलती हैं, सस्ती थोड़ी मिलेंगी. वहीं दुकानदारों का कहना है कि बिना डॉक्टर के पर्चे के कोई भी दवाई नहीं दी जाती है और अगर बाजार में किसी दवाई की शॉर्टेज हो जाए, तो फिर वह दवाई और महंगी हो सकती है. सभी दवाइयां अलग-अलग कीमत की होती हैं और उनमें अलग-अलग मार्जिन तय होता है, क्योंकि हर जगह हर तरीके की ट्रेड प्रैक्टिस चलती है.
- जब एक अन्य दुकानदार से कैंसर की दवाई के बारे में पूछा गया, तो उसने कह दिया कि उसके पास ये दवाइयां नहीं हैं. उसका कहना था कि स्टैंडअलोन फार्मेसी में इस तरीके की दवाइयां इन सस्ती कीमतों पर नहीं बेची जाती हैं. एक दूसरे मेडिकल स्टोर वाले ने बताया कि इलाके के हिसाब से भी कभी-कभी दवाइयों के रेट में कम-ज्यादा हो जाता है. बड़े-बड़े अस्पताल अपने हिसाब से दवाई का रेट लगाते हैं, जबकि सामान्य दुकानदार एमआरपी पर 10 से 12 परसेंट तक ही ले सकते हैं.
- एक फार्मेसी संचालक ने News18India को बताया कि बेसिक मैकेनिज्म यही है कि जब हम दवाई बेचते हैं तो उस पर एमआरपी जरूर प्रभावित होता है, लेकिन स्टैंडअलोन फार्मेसी अपने हिसाब से चार्ज लेती है. उदाहरण के तौर पर 2000 रुपए की खरीद वाली दवाई को हम 2200 या 2300 रुपए का भी बेच सकते हैं. उनके मुताबिक एमआरपी उनके लिए अप्रासंगिक यानी इरेलीवेंट है, क्योंकि मार्केट पूरी तरह डायनेमिक है और अगर कोई बड़े अस्पताल के अंदर से दवाई खरीदेगा तो वहां मार्जिन कहीं ज्यादा हो सकता है.
डॉक्टर और मेडिकल स्टोर की सेटिंग व सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर दुकानदारों का क्या रुख है?
दवा बाजार में डॉक्टर और केमिस्ट के गठजोड़ को लेकर भी दुकानदारों ने दबी जुबान में सच्चाई स्वीकार की है. कई बार डॉक्टर और मेडिकल स्टोर के बीच में सीधा टाई-अप होता है. ऐसे में डॉक्टर मरीज को जो दवाई लिखते हैं, वह सिर्फ उन्हीं चुनिंदा दुकानों पर मिल पाती है जिनके साथ डॉक्टर की बातचीत और सेटिंग होती है. एक केमिस्ट ने खुलकर माना कि डॉक्टर और मेडिकल स्टोर के बीच सेटिंग का खेल होता है और हर ट्रेड में कुछ न कुछ इस तरीके की सेटिंग्स होती ही हैं.
वहीं जब एक अन्य मेडिकल स्टोर पर बैठी महिला से दवाइयों के मार्जिन पर सवाल किया गया, तो उसने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि मैं तो यहां पर सिर्फ फाइनेंस संभालती हूं, मुझे दवाइयों के बारे में कुछ नहीं पता है. जब उनसे पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी दवाइयों पर मार्जिन कम करने के लिए कहा है, तो महिला मेडिकल विक्रेता ने दो टूक जवाब दिया कि इसमें मैं क्या कर सकती हूं.
अन्य दुकानदारों का भी यही कहना रहा कि दवाइयों पर एमआरपी हाई होता है और भले ही वे उस पूरे रेट पर दवाई नहीं बेचते और लगभग 50 परसेंट पर सेल करते हैं, लेकिन यह दुकानदार खुद तय करता है कि दवाई कितने में बेचनी है. दवाइयों का दाम पूरी तरह मार्जिन पर डिपेंड करता है. एक दुकानदार ने तो दवाई की एमआरपी दिखाते हुए साफ तौर पर कहा कि यह हमारी मर्जी है, हम इसे एमआरपी के दायरे में कितने में भी बेच सकते हैं.
एशिया के सबसे बड़े दवा बाजार भागीरथ पैलेस के व्यापारियों ने कैसे खोली पूरे खेल की पोल?
चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस में स्थित एशिया के सबसे बड़े दवा मार्केट के व्यापारियों ने इस पूरे सिस्टम की खामियों को उजागर किया है.
- दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी आशीष ग्रोवर ने बताया कि चाहे एंटी-कैंसर दवाई हो या कोई अन्य दवाई हो, उस पर एमआरपी बहुत ज्यादा रहता है. प्राइस फिक्स किए जाने की लड़ाई वे लंबे समय से लड़ रहे हैं.
- उन्होंने स्पष्ट किया कि होलसेल मार्केट में व्यापारियों का मार्जिन पूरी तरह फिक्स है, इसलिए सरकार को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि आखिर दवाइयों का प्राइस फैक्टर ऐसा क्यों है. जब कंपनी की तरफ से छपने वाली एमआरपी ही इतनी महंगी होगी, तो मरीज को दवाई सस्ती कहां से मिलेगी.
- होलसेल से दवाई रिटेल काउंटर पर पहुंचती है और उसके बाद डिस्काउंट का इशू शुरू होता है, जहां से ग्राहक के लिए कीमतें बढ़ जाती हैं. कंपनियों द्वारा वन प्लस वन जैसी स्कीम दी जाती है और एमआरपी कई गुना ज्यादा रखी जाती है. दवाइयों के दाम इस तरीके से क्यों बढ़ रहे हैं, यह पॉलिसी मेकर्स को देखना चाहिए और ड्रग कंट्रोलर चाहे तो इस प्राइस हाइक पर तुरंत रोक लगा सकता है.
- ग्रोवर ने बताया कि जन औषधि केंद्र पर सस्ती दवाइयां जरूर मिलती हैं, लेकिन हर तरीके की दवाई वहां पर उपलब्ध नहीं होती, जिस कारण मरीज की मजबूरी होती है कि उसे रिटेल केमिस्ट से ही दवाई खरीदनी पड़ती है. होलसेल से रिटेलर खरीदता है और रिटेलर से पेशेंट खरीदते हैं, ऐसे में यह मार्जिन लगातार बढ़ता जाता है.
- उन्होंने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि जो दवाई बाजार में 4500 रुपए एमआरपी की है, होलसेल में उसकी कीमत मात्र 570 या 580 रुपए है जिस पर थोक व्यापारी उसे खरीद रहे हैं. जब तक पॉलिसी मेकर इस ओर ध्यान नहीं देंगे या फिर इस पर कोई सख्त नियम नहीं बनाए जाएंगे, तब तक इस पर पूरी तरीके से रोक लगाना मुश्किल है.
फिलहाल रिटेलर कस्टमर को देखकर अपने हिसाब से डिस्काउंट देता है और दवाई की कीमत वसूलता है. रिटेलर के पास मनमाना मार्जिन तय करने का अधिकार नहीं है, लेकिन दुकानदार धड़ल्ले से ऐसा कर रहे हैं और इसका सीधा खामियाजा बेचारे मरीज को भुगतना पड़ रहा है क्योंकि उसे मजबूरी में ज्यादा दाम में दवाई लेनी पड़ रही है.
