37 की उम्र में दिल का दौरा, 11 साल का संघर्ष और एक अजनबी की धड़कन; चंचल यादव की कहानी हिला देगी

कभी वॉलीबॉल खेलना तो कभी बैडमिंटन कोर्ट पर घंटों बिताना. दौड़ना और अपनी मर्जी से जिंदगी जीना चंचल यादव की पहचान थी. लेकिन महज 37 साल की उम्र में आए एक हार्ट अटैक ने उनकी दुनिया बदल दी. शुरुआत में उन्हें पता तक नहीं चला कि दिल को नुकसान पहुंच चुका है. धीरे-धीरे खेल छूट गया. फिर पैदल चलना भी मुश्किल होने लगा. छोटे-छोटे काम करते हुए शरीर थक जाता था. इसके बाद शुरू हुआ 11 साल का लंबा संघर्ष. दिल्ली के विकाशपुरी में रहने वाले बिजनेसमैन चंचल की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे शख्स के दिल से बची जिसे वह कभी जानते तक नहीं थे. 17 सितंबर को हरियाणा के रोहतक से करीब 95 किलोमीटर दूर तक सफर करके आया एक अजनबी का दिल उनके सीने में धड़कने लगा. यही है 37 की उम्र में दिल का दौरा झेलने वाले चंचल यादव की कहानी. एक ऐसा सफर जो जिंदगी की कीमत और अंगदान की अहमियत दोनों समझाता है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चंचल यादव को 2015 में हल्का हार्ट अटैक आया था. उन्हें इसका पता करीब तीन महीने बाद चला. तब तक दिल को काफी नुकसान हो चुका था. अगले कई साल में उनकी शारीरिक क्षमता लगातार घटती गई. 2023 में उनका नाम हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में दर्ज किया गया. इस बीच जुलाई 2026 में डॉक्टरों ने उनके शरीर में एक खास डिवाइस लगाया जो दिल की धड़कन खतरनाक तरीके से बिगड़ने पर बिजली का झटका देकर उसे सामान्य लय में लाने में मदद करता है. फिर 17 सितंबर को अस्पताल से फोन आया कि उनके लिए डोनर हार्ट उपलब्ध है. रोहतक से दिल्ली तक हार्ट को ग्रीन कॉरिडोर के जरिए पहुंचाया गया. ऑपरेशन सफल रहा और चंचल को नई जिंदगी मिली. अस्पताल में 25 दिन बिताने के बाद वह घर लौट आए हैं. अब उनकी नजर फिर से बैडमिंटन रैकेट उठाने पर है.

11 साल में खेल से पैदल चलने तक का सफर मुश्किल हुआ

चंचल ने बताया कि 2015 में आए हार्ट अटैक का उन्हें तुरंत एहसास नहीं हुआ. करीब तीन महीने बाद जांच में पता चला कि दिल को नुकसान पहुंच चुका है. इसके बाद उनकी जिंदगी से खेल धीरे-धीरे दूर होता गया. उन्होंने कहा, ‘इस बीमारी ने मुझे 11 साल तक खेलों से दूर रखा.’ समय के साथ परेशानी बढ़ती गई. चंचल के मुताबिक शरीर की हर गतिविधि पर पाबंदी लगने लगी. यहां तक कि पैदल चलना भी मुश्किल हो गया था. छोटी-सी मेहनत के बाद भी वह थक जाते थे. जून 2026 में जब वह फोर्टिस अस्पताल पहुंचे तो उनका दिल बेहद कमजोर हो चुका था.

डॉक्टरों ने बताया क्यों जरूरी था हार्ट ट्रांसप्लांट

फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियक सर्जन डॉ. दिनेश कुमार मित्तल के मुताबिक जब हार्ट का बायां वेंट्रिकल शरीर में खून पंप करने का काम ठीक से नहीं कर पाता तो हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है. सामान्य स्थिति में इसकी क्षमता 20 प्रतिशत से नीचे पहुंचने पर गंभीर चिंता होती है. कुछ मरीजों में यह घटकर 10 से 15 प्रतिशत तक रह जाती है. ऐसे में चलना-फिरना भी मुश्किल हो सकता है. जुलाई में चंचल के शरीर में इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर लगाया गया. यह डिवाइस दिल की धड़कन खतरनाक रूप से बिगड़ने पर उसे सामान्य लय में लाने के लिए बिजली का झटका दे सकता है. इससे उन्हें डोनर मिलने तक समय मिल सका.

रोहतक से दिल्ली तक एक धड़कन की रेस

17 सितंबर की सुबह फोर्टिस अस्पताल को नेशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) से सूचना मिली कि बी-पॉजिटिव मरीज के लिए उपयुक्त दिल उपलब्ध है. डोनर 41 साल का व्यक्ति था जिसकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उसके परिवार ने अंगदान की सहमति दी. दोपहर 2 बजकर 49 मिनट पर फोर्टिस के छह डॉक्टरों की टीम रोहतक के PGIMS के लिए रवाना हुई. वहां जांच के बाद दिल को प्रत्यारोपण के योग्य पाया गया. शाम 7 बजकर 20 मिनट पर विशेष घोल की मदद से दिल को सुरक्षित तरीके से रोकने की प्रक्रिया शुरू हुई. फिर उसे बर्फ से ठंडे रखे जाने वाले विशेष बैग में पैक किया गया. शाम 7 बजकर 40 मिनट पर दिल लेकर टीम दिल्ली के लिए निकली.

ग्रीन कॉरिडोर से 63 मिनट में अस्पताल पहुंचा हार्ट

हार्ट को तेजी से पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया. इसमें रास्ते के ट्रैफिक सिग्नल और पुलिस की व्यवस्था पहले से समन्वित की जाती है ताकि वाहन बिना अनावश्यक रुकावट के निकल सके. दिल रात 8 बजकर 43 मिनट पर फोर्टिस अस्पताल पहुंच गया. करीब 95 किलोमीटर का सफर एक घंटे तीन मिनट में पूरा हुआ. उस समय चंचल ऑपरेशन थिएटर में थे और उनके शरीर का ब्लड सर्कुलेशन तथा सांस लेने का काम कुछ समय के लिए हार्ट-लंग मशीन संभाल रही थी. डॉक्टरों ने खराब दिल को निकालकर डोनर का दिल लगाया और उसे शरीर में खून पहुंचाने वाली मुख्य नसों से जोड़ दिया. डॉ. मित्तल के मुताबिक ट्रांसप्लांट की मुख्य प्रक्रिया में आमतौर पर करीब 90 मिनट लगते हैं. रात करीब 2 बजे चंचल वेंटिलेटर से हटकर खुद सांस लेने लगे. डॉक्टर ने कहा, ‘जब उनके सीने में दिल धड़कने लगा तो यह हमारे लिए किसी चमत्कार जैसा था.’

25 दिन बाद घर लौटे चंचल को खेल में वापसी की उम्मीद

चंचल को अस्पताल से छुट्टी मिलने में 25 दिन लगे. अब वह घर पर आराम कर रहे हैं. उन्हें फिर से बैडमिंटन खेलने और तैरने का इंतजार है. उन्होंने कहा, ‘मैं दोबारा बैडमिंटन खेलना चाहता हूं. तैरना और दौड़ना भी चाहता हूं.’ हालांकि वह रैकेट उठाने से पहले करीब दो महीने आराम करना चाहते हैं और आगे की गतिविधियां डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक करेंगे. डॉक्टरों के मुताबिक हार्ट ट्रांसप्लांट में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ऑपरेशन करना नहीं बल्कि समय पर उपयुक्त अंग मिलना है. भारत में हर साल करीब 225 हार्ट ट्रांसप्लांट होते हैं जबकि अनुमानित जरूरत लगभग 50 हजार की है. अंगदान को लेकर गलत धारणाएं भी कई परिवारों को फैसला लेने से रोकती हैं. चंचल को मिली नई जिंदगी इस बात की याद दिलाती है कि किसी का अंगदान किसी दूसरे परिवार के लिए उम्मीद बन सकता है.

डोनर का हार्ट कैसे निकाला जाता है?

भारत में मानव अंग और टिशू ट्रांसप्लांटेशन कानून के तहत हार्ट निकालने से पहले व्यक्ति को ब्रेन-स्टेम डेड घोषित करना जरूरी है. यह फैसला चार डॉक्टरों की टीम करती है. इसमें न्यूरोसर्जन, मरीज का इलाज कर रहा डॉक्टर, अस्पताल का प्रभारी डॉक्टर और NOTTO से अधिकृत स्वतंत्र डॉक्टर शामिल होते हैं. जांच के दौरान एपनिया टेस्ट भी किया जाता है. इसमें कुछ समय के लिए वेंटिलेटर से अलग करके देखा जाता है कि मरीज खुद सांस लेने की कोशिश करता है या नहीं. खून में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने के बावजूद सांस लेने की कोशिश न होना ब्रेनस्टेम के काम न करने का संकेत है. मृत्यु की औपचारिक पुष्टि और परिवार की लिखित सहमति के बाद ही अंग निकालने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.

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