Success Story: ₹100 भी नहीं थे घर में, मां के जेवर 3000 में बेचकर दिल्ली आए थे डॉ. संतोष, जानें सफलता का राज

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Success Story: बेतिया के डॉ. संतोष पटेल ने गरीबी से संघर्ष कर दिल्ली डीएसईयू में असिस्टेंट रजिस्ट्रार की नौकरी पाई. आज वह भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मुहिम चला रहे हैं. आइये जानते हैं उनकी सफलता के बारे में.

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नई दिल्ली: बिहार के एक छोटे से शहर बेतिया से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली में आकर एक बड़ी सरकारी यूनिवर्सिटी में नौकरी करना और दिल्ली में भोजपुरी समाज और भोजपुरी भाषा के लिए बीते 23 सालों से लड़ाई लड़ने वाले डॉ. संतोष पटेल के संघर्ष और सफलता की कहानी इतनी आसान बिल्कुल भी नहीं है, जितना सुनने में आपको लग रही है. एक वक्त ऐसा था जब डॉ. संतोष पटेल को दिल्ली आना था और उनके घर में 100 रुपए भी नहीं थे. तब मां ने अपने बेटे को दिल्ली भेजने के लिए अपने सोने के गहने बेच दिए थे, जिससे उस समय 3000 रुपए मिले थे.

उस 3000 रुपए को लेकर के डॉ. संतोष पटेल दिल्ली आए और आज आलम यह है कि देश की राजधानी दिल्ली के द्वारका में उन्होंने अपना खुद का घर बनवाया और अपने दोनों बेटों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फॉरेंसिक साइंस में पढ़ाई करवा रहे हैं. यही नहीं, देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी डॉ. पटेल को उनकी प्रतिभा के लिए गोल्ड मेडल से सम्मानित किया है.  वर्तमान में डॉ. संतोष पटेल दिल्ली कौशल और उद्यमिता विश्वविद्यालय (डीएसईयू) में अस्सिटेंट रजिस्टार के साथ-साथ बिजनेस और एग्जामिनेशन जैसी तमाम जिम्मेदारियां यहां पर निभा रहे हैं. आपको बता दें कि हिंदी के मशहूर कवि गोरख प्रसाद मस्ताना डॉ. संतोष पटेल के पिता हैं.

मंडल कमीशन में खाई लाठियां

डॉ. संतोष पटेल ने बताया कि उनका जन्म बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेतिया में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई वहीं के स्कूल से हुई. इसके बाद बाकी की पढ़ाई के लिए भागलपुर यानी भरतशिला यानी बांका गए और इसके बाद फिर बेतिया लौटकर के आए और वहां से आईएससी में पढ़ाई पूरी की. इसके बाद पटना आ गए. जहां से इन्होंने नालंदा कोचिंग सेंटर से पढ़ाई की. करीब साल 1990 के दौरान मंडल कमीशन के लिए संघर्ष किया और लाठियां भी खाईं. उस वक्त देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे.

उन्होंने बताया कि इसके बाद पटना से इंग्लिश में एमए किया और 1996 में स्टाफ सिलेक्शन कमीशन से उनका चयन हुआ. इसी दौरान शादी हुई और शादी के 13 दिन बाद उनको नौकरी मिल गई. उन्होंने बताया कि उनका सपना प्रोफेसर बनने का था, लेकिन प्रोफेसर बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. उन्होंने पीएचडी 2 बार करने की कोशिश की, लेकिन नहीं हो सकी. फिर 2017 में इग्नू‎ से उन्होंने पीएचडी की और 2020 में उन्हें पीएचडी की उपाधि मिल गई.

मां ने बेच दिए थे जेवर

डॉ. संतोष पटेल ने बताया कि 1996 में उन्हें दिल्ली आना था. उस वक्त घर के हालात ठीक नहीं थे. क्योंकि पिता शिक्षक थे और दादा द्वारका प्रसाद बिहार के पहले एंटरप्रेन्योर थे. क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले बेतिया जैसी जगह पर और पश्चिमी चंपारण में चाट पकोड़े बेचना शुरू किया. उनसे पहले इसे कोई नहीं बेचता था, लेकिन उनके बाद अब करीब 2 लाख परिवार यही काम वहां पर कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि 1996 में जब उन्हें बिहार से दिल्ली आना था. स्टाफ सिलेक्शन कमीशन में जब उनका चयन हुआ तो इससे पहले बिहार से दिल्ली आने के लिए उनके मां चिंता देवी ने जेवर अपने बेच दिए थे, जिसे 3000 रुपए मिले थे. उसी से वह दिल्ली आए और अब दिल्ली में ही नौकरी कर रहे हैं. आज भी वह अपने शहर आते जाते रहते हैं. भोजपुरी जन जागरण अभियान के अध्यक्ष डॉ. संतोष पटेल 2003 से भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रदर्शन करते आ रहे हैं.

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Brijendra Pratap Singh

बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें

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