ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने शनिवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने शांति मुचलका भरने से इनकार कर दिया. यह मामला दिल्ली पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस से जुड़ा है, जिसमें उन्हें 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि का एक जमानतदार पेश करने के लिए कहा गया था. इससे एक दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नोटिस को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी थी. अब नेहा बोरा ने इस नोटिस के औचित्य पर ही सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर उनसे किसकी शांति बनाए रखने के लिए कहा जा रहा है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के संसदीय कार्यालय में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान नेहा बोरा ने कहा कि सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है. उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखना और उससे सवाल पूछना शांति के लिए खतरा कैसे हो सकता है.
बोरा ने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने और असहमति जताने का अधिकार लोकतंत्र का मूल आधार है. उन्होंने कहा, ‘अगर हम सरकार से कोई सवाल नहीं पूछेंगे, तो हम किसकी शांति बनाए रख रहे हैं?’ उन्होंने साफ किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उनकी लड़ाई चाहे जिस दिशा में जाए, लेकिन शांतिपूर्ण असहमति को शांति भंग करने का खतरा नहीं माना जाना चाहिए.
दिल्ली पुलिस ने 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत नेहा बोरा को नोटिस जारी किया था. इसमें उन्हें विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होकर यह बताने के लिए कहा गया था कि जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उनसे 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार क्यों न लिया जाए.
यह नोटिस उस समय जारी हुआ था, जब दिल्ली पुलिस ने राजधानी में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने के दौरान नेहा बोरा को हिरासत में लिया था. इस प्रदर्शन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही थी. प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था.
नेहा बोरा ने पुलिस के नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उन्होंने दलील दी थी कि यह कार्रवाई शांतिपूर्ण असहमति को दबाने का प्रयास है और नोटिस में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं बताया गया, जिससे यह साबित हो कि उनकी गतिविधियों से शांति भंग होने की आशंका है.
हालांकि, शुक्रवार को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसके बाद शनिवार को SEM के समक्ष उन्होंने शांति मुचलका भरने से इनकार कर दिया और नोटिस की जरूरत पर सवाल उठाए.
नेहा बोरा ने दोहराया कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को सार्वजनिक कानून-व्यवस्था के उल्लंघन के बराबर नहीं माना जाना चाहिए. उनके मुताबिक, लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और अपनी असहमति जाहिर करने का अधिकार है.
