कभी जिन रंगों को पहचानना था मुश्किल, आज उन्हीं से बनाई पहचान, देवांशी की कला और मां के हौसले की कहानी है ‘आत्मरंग’

दिल्ली. दिल्ली की देवांशी की कहानी दिल को छू लेने वाली है. कभी जिन रंगों को पहचानना भी उनके लिए आसान नहीं था, आज उन्हीं रंगों से वह अपनी एक अलग पहचान बना रही हैं. मंडाला की बारीक-बारीक डिजाइन में रंग भरना देवांशी की पसंद ही नहीं, बल्कि उनके जीवन का एक खास हिस्सा बन चुका है. इस सफर में उनके साथ खड़ी हैं उनकी मां शालिनी शरद, जिन्होंने बेटी की छोटी-सी रुचि को उसकी ताकत बनाने की कोशिश की. आज इसी कोशिश का नाम है ‘आत्मरंग’, जहां देवांशी की कला कई खूबसूरत प्रोडक्ट्स पर नजर आती है.

जिसने बदल दी जिंदगी की दिशा
शालिनी बताती हैं कि देवांशी बचपन में काफी हाइपरएक्टिव थीं. उनका ध्यान एक जगह टिकाना मुश्किल होता था. डॉक्टरों की सलाह के बाद परिवार ने उनकी एकाग्रता बढ़ाने और ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए कई गतिविधियां आजमाईं. डांस, स्विमिंग, ड्रॉइंग और बेकिंग जैसी क्लासेज भी कराईं, लेकिन रंग भरने में देवांशी की दिलचस्पी कुछ अलग ही थी.

शालिनी ने बताया कि जब देवांशी करीब 10 साल की थीं, तब उन्हें रंग भरने की गतिविधि से जोड़ा गया. धीरे-धीरे वह इस काम में मन लगाने लगीं. जहां पहले कुछ देर बैठना मुश्किल होता था, वहीं अब वह एक-दो घंटे तक बैठकर रंग भर सकती हैं. मां के लिए यह बदलाव किसी बड़ी खुशी से कम नहीं था.

जिन रंगों को सिखाया, उन्हीं रंगों ने बनाई पहचान
देवांशी के लिए रंगों को पहचानना भी कभी एक चुनौती था. उनकी मां ने लाल रंग समझाने के लिए लाल कपड़े, पेंसिल बॉक्स, टिफिन और पानी की बोतल जैसी चीजों का सहारा लिया. इसी तरह दूसरे रंगों को भी पहचानना सिखाया गया.

आज देवांशी मंडाला की बारीक डिजाइन में रंग भरती हैं. वह खुद मंडाला नहीं बनातीं, लेकिन उनमें अपनी पसंद से रंग भरती हैं. उनकी मां ने देवांशी की पुरानी कलाकृतियां भी संभालकर रखी हैं, ताकि शुरुआती दिनों से लेकर आज तक का बदलाव देखा जा सके.

बेटी की कला से खड़ा किया आत्मरंग
देवांशी की इसी कला को आगे बढ़ाने के लिए शालिनी ने आत्मरंग ब्रांड की शुरुआत की. इस नाम में आत्मा और रंगों का भाव जुड़ा है. करीब दो साल से परिवार इस काम को आगे बढ़ा रहा है. देवांशी की कलाकृतियों को डिजिटल रूप देकर लकड़ी के सामान और कैनवास टोट बैग्स जैसे प्रोडक्ट्स पर उतारा जाता है. इनमें मैंगो वुड और पाइन वुड से बने प्रोडक्ट्स भी शामिल हैं. इस तरह जो रंग कभी सीखने का एक जरिया थे, आज वही उनकी कला को लोगों तक पहुंचा रहे हैं.

मां का सफर, जिसमें हर दिन एक नई सीख है
शालिनी और उनके पति दोनों कामकाजी हैं. ऐसे में घर और काम के साथ देवांशी की जरूरतों का ध्यान रखना हमेशा आसान नहीं रहा. शालिनी बताती हैं कि देवांशी को रोजमर्रा के काम सिखाने से लेकर समाज में सही और गलत का फर्क समझाने तक, आज भी उन्हें लगातार प्रयास करने पड़ते हैं.

देवांशी अब 21 साल की हैं और नवंबर में 22 साल की हो जाएंगी, लेकिन मां के लिए उन्हें सिखाने का सिलसिला आज भी जारी है. शालिनी मानती हैं कि हर बच्चे की अपनी खूबियां और अपनी जरूरतें होती हैं. जरूरत है तो बस उन खूबियों को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने की.

बेटी पर गर्व, क्योंकि उसने अपने रंग खुद चुने
शालिनी के लिए देवांशी की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ उनके बनाए प्रोडक्ट्स नहीं, बल्कि वह सफर है जिसमें उनकी बेटी ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई है. वह कहती हैं कि लोग कई बार पूछते हैं कि एक स्पेशल बच्चे की परवरिश कैसी होती है, लेकिन उनके लिए देवांशी किसी परेशानी का नाम नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद हैं.

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