दिवाली की जहरीली हवा बच्चों के फेफड़ों पर डाल सकती है असर, डॉक्टर से जानें बचाव का तरीका

फरीदाबाद: दिवाली के आसपास दिल्ली-NCR की हवा में प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ जाता है. कई बार AQI 400 से 700 तक पहुंच जाता है. ऐसे में कुछ दिनों तक जहरीली हवा में सांस लेना भी फेफड़ों के लिए नुकसानदायक हो सकता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है. इतना ही नहीं, प्रदूषण का असर हवा साफ होने के बाद भी लंबे समय तक रह सकता है. इस बारे में अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के पल्मोनोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रदीप बजाज ने Local18 से खास बातचीत की और बताया कि प्रदूषण फेफड़ों को किस तरह प्रभावित करता है.

पहले से सांस के मरीजों को ज्यादा खतरा

डॉ. प्रदीप बजाज बताते हैं कि प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर उसी समय दिखाई देता है, जब AQI खराब होता है. लेकिन जिन लोगों को पहले से COPD, अस्थमा या ILD जैसी फेफड़ों की बीमारी है, उनमें इसका असर लंबे समय तक रह सकता है. ऐसे मरीजों को जहरीली हवा के संपर्क में आने से ज्यादा परेशानी हो सकती है.

सिगरेट न पीने वालों के फेफड़े भी हो सकते हैं प्रभावित

डॉक्टर प्रदीप बताते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है कि फेफड़ों की बीमारी सिर्फ सिगरेट, बीड़ी या हुक्का पीने वालों को ही हो. कई ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, लेकिन उन्हें गंभीर अस्थमा या लंग फाइब्रोसिस जैसी बीमारी हो सकती है. बच्चों और 75 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए भी प्रदूषण खतरनाक है. उम्र बढ़ने के साथ फेफड़ों की क्षमता प्राकृतिक रूप से कम होने लगती है.

बच्चों के फेफड़ों की ग्रोथ पर पड़ता है असर

डॉ. प्रदीप बताते हैं कि बच्चों के फेफड़े लगभग 14 से 16 साल की उम्र तक विकसित होते रहते हैं. ऐसे में अगर इस दौरान बच्चा लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेता है, तो उसके फेफड़ों को लंबे समय तक नुकसान पहुंच सकता है. इससे आगे चलकर अस्थमा और सांस से जुड़ी दूसरी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. फेफड़ों के विकास के समय होने वाला नुकसान उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकता है.

खांसी आने से पहले भी पता चल सकता है नुकसान

डॉक्टर प्रदीप बताते हैं कि जरूरी नहीं कि फेफड़ों को नुकसान होने पर तुरंत खांसी या सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई दें. इसके लिए PFT यानी पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और स्पाइरोमेट्री जैसी जांच की मदद ली जा सकती है. इन जांचों से लक्षण दिखाई देने से पहले ही फेफड़ों की क्षमता के बारे में पता लगाया जा सकता है. इसके लिए पल्मोनोलॉजिस्ट से जांच करवाना फायदेमंद हो सकता है.

AQI 500 पार होने पर क्या करें?

डॉ. प्रदीप बताते हैं कि जब AQI 500 से 600 तक पहुंच जाता है, तो लोगों को बाहर की गतिविधियां कम कर देनी चाहिए. हालांकि, लगातार प्रदूषण रहने पर घर के अंदर की हवा भी प्रभावित हो सकती है. ऐसे में घर के अंदर रहना, एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना और पहले से सांस की बीमारी होने पर अपनी दवाइयां समय पर लेना जरूरी है. मरीजों को डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए और मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन के अनुसार ही इलाज जारी रखना चाहिए.

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