देश के सबसे आधुनिक शहरों में से एक नोएडा जहां गगनचुंबी इमारतें और चमचमाती सड़कें हैं वहां की रसोइयों से सिलेंडर गायब हो रहे हैं. धुआं उठ रहा है लेकिन वह किसी फैक्ट्री का नहीं बल्कि पीजी (PG) की रसोई का, जहां 55 छात्रों का भविष्य और पेट दोनों दांव पर लगे हैं. यह कहानी केवल एक किल्लत की नहीं है बल्कि उस मजबूरी की है जिसने एक आधुनिक पीजी संचालक को स्मार्टफोन पर यूट्यूब खोलकर मिट्टी का चूल्हा बनाना सीखने पर मजबूर कर दिया. आज नोएडा के सेक्टर-26 में गैस की नीली लौ की जगह कोयले की लाल अंगारें धधक रही हैं जो इस बात की गहवाही दे रहे हैं कि युद्ध की आग आम आदमी की थाली तक पहुंच चुकी है.
यूट्यूब से सीखी भट्टी बनाना
नोएडा सेक्टर 26 में पीजी चलाने वाले अंकुर बताते हैं कि उनके पास करीब 55 छात्र रहते हैं. पिछले कुछ दिनों से सिलेंडर की किल्लत और आपूर्ति में देरी के चलते किचन चलाना असंभव हो गया था. सिलेंडर की कमी का समाधान उन्होंने इंटरनेट पर खोजा. यूट्यूब पर वीडियो देखकर उन्होंने खुद एक ईंटों की भट्टी (चूल्हा) तैयार की. अब इसी भट्टी पर थोक में खरीदे गए कोयले के जरिए खाना पकाया जा रहा है. अंकुर का कहना है, “यह हमारी मजबूरी है. कोयले पर रोटी बनाना बेहद कठिन और समय लेने वाला काम है, इसलिए फिलहाल हम केवल दाल और चावल बनाकर बच्चों का पेट भर रहे हैं ताकि वे भूखे न रहें.”
कोयला भी हुआ महंगा
ईंधन का विकल्प बदलना भी अब जेब पर भारी पड़ रहा है. मांग बढ़ने के कारण कोयले की कीमतों में भारी उछाल आया है. पीजी संचालक के अनुसार, जो कोयला पहले 30 से 35 रुपये प्रति किलो मिलता था, वह अब 55 रुपये किलो के पार पहुंच गया है. एक तरफ सिलेंडर नहीं मिल रहा और दूसरी तरफ वैकल्पिक ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पीजी और हॉस्टल का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है.
बच्चों के भविष्य और सेहत की चिंता
पीजी में रहने वाले 55 छात्रों के लिए समय पर भोजन जुटाना एक बड़ी चुनौती बन गई है. कई ऑफिस और कॉलेजों की कैंटीन बंद होने के कारण छात्र पूरी तरह पीजी के खाने पर निर्भर हैं. संचालक का कहना है कि कोयले पर खाना बनाने में एलपीजी की तुलना में दोगुना समय लग रहा है. उन्हें सरकार पर भरोसा तो है कि स्थिति जल्द सुधरेगी लेकिन फिलहाल की जमीनी हकीकत छात्रों और संचालकों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है.
सवाल-जवाब
नोएडा के पीजी संचालकों को कोयले का इस्तेमाल क्यों करना पड़ रहा है?
ईरान संकट और एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति में कमी के कारण सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं जिसके चलते खाने के लिए कोयले की भट्टी का सहारा लिया जा रहा है.
कोयले की कीमतों में पिछले कुछ दिनों में कितना बदलाव आया है?
कोयले के दाम 30-35 रुपये प्रति किलो से बढ़कर अब 55 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं.
कोयले पर खाना बनाने में किस तरह की व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?
कोयले की आंच पर खाना बनाने में एलपीजी से दोगुना समय लगता है और रोटी बनाना मुश्किल होने के कारण केवल दाल-चावल ही बनाए जा रहे हैं.
