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Barmer News : सरहदी बाड़मेर में आज भी महिलाएं गोल घेरा बनाकर बैठती हैं. सुर और लय का सामंजस्य बैठाकर गीतों के माध्यम से भगवान की महिमा, लोक देवताओं की कथाएं और जीवन के अनुभवों को गाती है. बाड़मेर के जसदेर धाम में आयोजित वीणा उत्सव में भी हरजस गायन ने हर किसी का मन मोह लिया.
बाड़मेर. मरुधरा की मिट्टी में रची-बसी परंपराओं के बीच हरजस गायन आज भी आस्था और लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण बना हुआ है. यहां महिलाएं एक साथ बैठकर भगवान की स्तुति के साथ पारंपरिक लोक गीतों को सुरों में पिरोती हैं. जब सैकड़ों आवाजें एक सुर में गूंजती हैं, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो उठता है और गांव की चौपाल से लेकर मंदिर तक भक्ति की अनूठी छटा बिखर जाती है.
राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में हरजस गायन केवल भजन गाने की परंपरा नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था का प्रतीक है. सरहदी बाड़मेर में आज भी महिलाएं गोल घेरा बनाकर बैठती हैं और सुर-लय के साथ गीतों के माध्यम से भगवान की महिमा, लोक देवताओं की कथाएं और जीवन के अनुभवों को प्रस्तुत करती हैं. बाड़मेर के जसदेर धाम में आयोजित वीणा उत्सव में भी हरजस गायन ने सभी का मन मोह लिया. हरजस में एक महिला मुखड़ा उठाती है और बाकी महिलाएं उसी सुर में उसका साथ देती हैं. इस सामूहिक प्रस्तुति में संगीत के साथ भावनाओं का गहरा जुड़ाव दिखाई देता है, जो श्रोताओं को भक्ति में डुबो देता है.
हर अवसर पर निभाई जाती है परंपरा
शादी-ब्याह, तीज-त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान या किसी विशेष पूजा, हर मौके पर हरजस गायन की परंपरा निभाई जाती है. यह महिलाओं के लिए खुशी साझा करने और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी है. वाणी उत्सव में हरजस गायन के दौरान महिलाएं बाड़मेर जिला मुख्यालय के अलावा चौहटन, धोरीमन्ना, धनाऊ, सेड़वा, सनावड़ा, सिणधरी और बायतु सहित अन्य क्षेत्रों से पहुंचीं और अपनी प्रस्तुतियां दीं.
आधुनिक दौर में भी बरकरार प्रभाव
आधुनिकता के इस दौर में जहां मनोरंजन के साधन तेजी से बदल रहे हैं, वहीं हरजस गायन अपनी सादगी और आत्मीयता के कारण आज भी जीवंत बना हुआ है. हरजस गायिका इमरती चौधरी बताती हैं कि गांवों में यह परंपरा बिना किसी मंच या तकनीक के आज भी उतनी ही प्रभावशाली है, जितनी वर्षों पहले थी. इसमें महिलाएं समूह में बैठकर सामूहिक रूप से गायन करती हैं.
सामूहिक स्वर ही असली पहचान
ढोलक, मंजीरा और तालियों की लय पर गूंजते भजन गांव की गलियों से लेकर मंदिरों तक आध्यात्मिक माहौल बना देते हैं. इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें किसी एक गायक की नहीं, बल्कि पूरी टोली की आवाज ही इसकी पहचान होती है. यही सामूहिकता हरजस गायन को खास बनाती है और इसे आज भी जीवंत बनाए हुए है.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
