सफर से पहले ही थक जाते हैं लोग! कौशांबी-आनंद विहार में जाम और अतिक्रमण ने बढ़ाई यात्रियों की मुश्किलें

Ghaziabad News: दिल्ली और गाजियाबाद की सीमा पर स्थित कौशांबी बस डिपो और आनंद विहार बस टर्मिनल कहने को तो परिवहन के सबसे बड़े केंद्र हैं, लेकिन हकीकत में यह यात्रियों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. रोजाना हजारों लोग यहां से गुजरते हैं, मगर बुनियादी सुविधाओं के नाम पर उन्हें मिलता है अवैध कब्जे, बंद पड़े एस्केलेटर और घंटों का जाम. प्रशासन की नाक के नीचे चल रही इस अव्यवस्था ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है.

सफर कम, संघर्ष ज्यादा: ग्राउंड जीरो की हकीकत
दिल्ली-एनसीआर के सबसे व्यस्त इलाकों में शुमार कौशांबी और आनंद विहार के बीच की दूरी महज कुछ मीटर है, लेकिन इस दूरी को तय करने में यात्रियों के पसीने छूट जाते हैं. उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा पर स्थित यह इलाका आज प्रशासनिक लापरवाही और विभागों के बीच तालमेल की कमी का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है. सामान के साथ बसों में चढ़ना-उतरना किसी युद्ध जीतने जैसा अनुभव हो गया है.

अतिक्रमण का जाल और यात्रियों की मुसीबत
कौशांबी बस डिपो के गेट नंबर 1 और 2 के सामने का मंजर किसी मेले जैसा नजर आता है, लेकिन यह मेला यात्रियों की राह रोकने के लिए लगा है. गेट के ठीक सामने ऑटो और ई-रिक्शा चालकों का अवैध कब्जा रहता है. स्थिति यह है कि रोडवेज बसों को डिपो के अंदर ले जाने और बाहर निकालने के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ती है.

पैदल चलने वाले यात्रियों के लिए तो फुटपाथ जैसी कोई चीज बची ही नहीं है. सड़क के दोनों ओर अवैध रूप से सजी दुकानों और रेहड़ी-पटरी वालों ने पूरे रास्ते को घेर रखा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि कई सालों से जस की तस बनी हुई है. त्यौहारों के समय तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब भीड़ बढ़ने के साथ-साथ अतिक्रमणकारी भी सड़कों पर और आगे बढ़ आते हैं.

सफेद हाथी बने लाखों के एस्केलेटर
यात्रियों की सुविधा के लिए लाखों-करोड़ों की लागत से लगाए गए एस्केलेटर आज ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहे हैं. सालों से खराब पड़े इन एस्केलेटरों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. बुजुर्गों, महिलाओं और भारी सामान लेकर चलने वाले यात्रियों को मजबूरन सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ता है. विडंबना यह है कि ये सीढ़ियां भी अतिक्रमण की वजह से आधी घिरी रहती हैं. सीढ़ियों के नीचे अवैध दुकानें सजी हैं, जिससे यात्रियों की आवाजाही और भी मुश्किल हो जाती है.

जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते विभाग
इस पूरी अव्यवस्था के पीछे सबसे बड़ा कारण विभागों के बीच की खींचतान है. उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के अधिकारियों का तर्क है कि एस्केलेटर ठीक कराना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. अतिक्रमण हटाने के मुद्दे पर गाजियाबाद रीजन के आरएम केएन चौधरी का कहना है,

हमने अपने स्तर से संबंधित विभागों को पत्र लिखा है. चाहे वह अतिक्रमण हटाना हो या एस्केलेटर ठीक करना, विभागों की तरफ से अक्सर कोई जवाब नहीं मिलता. त्यौहारों के समय हम खुद पहल करके अतिक्रमण हटवाते हैं, जबकि यह हमारा कार्यक्षेत्र नहीं है.

प्रशासनिक लापरवाही और कागजी कार्रवाई
गाजियाबाद नगर निगम और दिल्ली नगर निगम के बीच बॉर्डर का इलाका होने के कारण कार्रवाई अक्सर ठंडे बस्ते में चली जाती है. पूर्व पार्षद मनोज गोयल बताते हैं कि उन्होंने अतिक्रमण को लेकर कई बार शिकायतें की हैं. नगर निगम की टीम आती तो है, लेकिन उनके जाते ही कुछ घंटों बाद हालात फिर वैसे ही हो जाते हैं. स्थानीय पुलिस और प्रशासन की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह पूरा इलाका ‘नो मैन्स लैंड’ जैसा नजर आता है, जहां कानून के बजाय दबंग अतिक्रमणकारियों का राज चलता है.

ट्रैफिक का दमघोंटू माहौल
अतिक्रमण का सीधा असर ट्रैफिक पर पड़ता है. दिल्ली-गाजियाबाद का यह मुख्य मार्ग हमेशा जाम की चपेट में रहता है. ऑटो और ई-रिक्शा चालक बीच सड़क पर सवारियां बैठाते हैं, जिससे पीछे आ रही गाड़ियों की लंबी कतार लग जाती है. शाम के समय स्थिति और भी खराब हो जाती है जब ऑफिस से लौटने वाले लोगों की भीड़ और बसों का दबाव बढ़ जाता है. प्रदूषण और शोर-शराबे के बीच यात्री खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *