Ghaziabad: कभी व्यापारियों की लगी रहती थी भीड़, अब ठंडा हुआ कारोबार, 60 साल पुराने मछली मार्केट पर क्यों मंडरा रहा संकट?

Last Updated:

Ghaziabad News: गाजियाबाद में मछली व्यापार का कारोबार लगातार घटता जा रहा है. एक दौर ऐसा था जब मछली खरीदने के लिए लोगों के पास यही सबसे बड़ा और भरोसेमंद बाजार हुआ करता था. आइए जानते हैं कि यहां मछली व्यापार में कमी का मुख्य कारण क्या है.

गाजियाबाद: जिले के घंटाघर क्षेत्र के पास स्थित 60 साल पुरानी मछली मार्केट कभी शहर की पहचान हुआ करती थी. एक दौर ऐसा था जब मछली खरीदने के लिए लोगों के पास यही सबसे बड़ा और भरोसेमंद बाजार हुआ करता था. सुबह होते ही यहां ग्राहकों की भीड़ लग जाती थी और दूर-दराज के जिलों से लोग ताजी मछलियां खरीदने पहुंचते थे, लेकिन समय के साथ हालात बदले और अब यह बाजार अपने पुराने दौर को याद करता नजर आता है.

कभी गाजियाबाद की इकलौती मछली मार्केट रही यह जगह आज भी शहर के पुराने व्यापार की कहानी बयां करती है. व्यापारियों के मुताबिक, घंटाघर क्षेत्र की यह मार्केट केवल मछलियों के लिए ही नहीं, बल्कि शहर के सबसे पुराने देसी शराब के ठेके के कारण भी मशहूर थी. उस समय अगर किसी को मछली या देसी शराब खरीदनी होती थी, तो लोग सीधे इसी बाजार का रुख करते थे. यहां का व्यापार इतना बड़ा था कि सुबह से लेकर देर रात तक बाजार में रौनक बनी रहती थी.

गाजीपुर मंडी की ओर जाने लगे व्यापारी
मछली व्यापारियों का कहना है कि दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर स्थित गाजीपुर मछली मंडी खुलने के बाद यहां के व्यापार पर बड़ा असर पड़ा. धीरे-धीरे बड़े व्यापारी और ग्राहक गाजीपुर मंडी की ओर जाने लगे, जिसके चलते घंटाघर की इस पुरानी मार्केट की चमक फीकी पड़ती चली गई. इसके अलावा शहर में अलग-अलग जगहों पर लगने वाली साप्ताहिक मंडियों ने भी इस बाजार के व्यापार को प्रभावित किया. पहले जहां रोजाना भारी भीड़ जुटती थी, वहीं अब गिने-चुने ग्राहक ही यहां पहुंचते हैं.

बढ़ते प्रदूषण ने किया प्रभावित
हालांकि आज भी इस बाजार में कई तरह की ताजी मछलियां मिल जाती हैं. यहां रोहू, कतला, सुरमई समेत कई किस्मों की मछलियां बिकती हैं. व्यापारियों के अनुसार, मछलियां मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं कांटे वाली और सिंगल कांटे वाली. पहले यहां मछलियों की वैरायटी काफी ज्यादा हुआ करती थी, लेकिन गाजियाबाद की हिंडन नदी में बढ़ते प्रदूषण ने इस व्यापार को भी प्रभावित किया. व्यापारियों का कहना है कि साल 1991 के बाद हिंडन नदी में गंदा पानी आने लगा, जिसके कारण कई प्रजातियों की मछलियां कम होती चली गईं. अब बाजार में ज्यादातर मांगुर मछली देखने को मिलती है.

लगातार घट रही प्रजातियों की संख्या
उनका दावा है कि मांगुर मछली छोटी मछलियों को खत्म कर देती है, जिससे दूसरी प्रजातियों की संख्या लगातार घटती जा रही है. आज भी घंटाघर की यह पुरानी मछली मार्केट अपनी पहचान बचाए हुए है. यहां दर्जनों मछली व्यापारियों के साथ कई मुर्गा व्यापारियों की दुकानें भी मौजूद हैं. भले ही व्यापार पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन यह बाजार आज भी गाजियाबाद के पुराने इतिहास और पारंपरिक व्यापार की एक अहम निशानी बना हुआ है.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *