नई दिल्ली: बिहार के खान सर की ही तरह दिल्ली में एक ऐसे गुरु हैं, जो किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नहीं हैं, लेकिन फिर भी दिल्ली की सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेज के स्टूडेंट इन्हें जानते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के खास तौर पर स्टूडेंट्स इनसे पढ़ते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट अपने खुद के प्रोफेसर को उतना नहीं जानते होंगे, जितना मनोज गर्ग को जानते हैं. बच्चों के बीच इनकी दीवानगी ऐसी है कि बच्चे इनसे ऑफलाइन के साथ-साथ ऑनलाइन भी क्लास करते हैं.
दरअसल, आपको बता दें कि यहां बात हो रही है शिक्षक मनोज गर्ग की. जिन्होंने 9 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था और मां के साथ नानी के घर रहने आ गए थे. यहीं से शुरू हुआ इनका असली संघर्ष, जब उन्होंने लोगों की गाड़ियां साफ की. जिस बस में ज्यादा भीड़ होती थी, उसी बस के आने का बस स्टॉप पर इंतजार करते थे. ताकि कंडक्टर उनसे भीड़ की वजह से टिकट ही ना ले पाए, लेकिन आज देश की राजधानी दिल्ली में इनके दो बड़े कोचिंग सेंटर चलते हैं. घर में चार बड़ी गाड़ियां हैं और बेहद महंगे इलाके में इनका खुद का अलीशान घर है.
पढ़ाने के जुनून ने दिलाई सफलता
मनोज गर्ग की जो कोचिंग है, वह पीएमजी के नाम से चलती है. पीएमजी के पीछे पूरा नाम बताते हुए उन्होंने कहा कि पूरन मनोज गर्ग इसका नाम है. पूरन उन्होंने अपने दादा का नाम अपने आगे लगाया है. इस कोचिंग की शुरुआत उन्होंने 2014 में की थी, लेकिन इससे पहले की कहानी 25 साल पुरानी है. उन्होंने बताया कि बचपन में घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. पिता एक अच्छे और सम्मानित व्यक्ति समाज में थे, लेकिन उनकी मृत्यु 1996 में हो गई थी.
तब उनकी उम्र सिर्फ 9 साल 11 महीने की थी और वह 6 कक्षा में पढ़ते थे. पिता इकलौते घर के कमाने वाले थे, जिस वजह से उनकी मृत्यु के बाद घर चलाना मुश्किल हो गया. मां अपने पिता के घर यानी नाना के घर उन्हें और उनकी बड़ी बहन को ले आई. नाना ने बहुत सहयोग किया, लेकिन घर का खर्च चलाने के लिए स्कूल जाने से पहले इन्होंने 75 रुपए में लोगों की गाड़ियां साफ की. लॉरेंस रोड दिल्ली में पहली कक्षा के एक बच्चे को ट्यूशन पढ़ाया.
वहां तक जाने के लिए कभी पैदल कई किलोमीटर चले जाते थे तो कभी भरी हुई बस आने का इंतजार करते थे. ताकि उसमें चढ़ेंगे तो कंडक्टर टिकट नहीं मांगेगा. इसके अलावा गत्ता बनाने वाले प्लांट में भी इन्होंने नौकरी की. वहां से 2100 रुपए उन्हें मिलते थे. 2004 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में इन्होंने बीकॉम ऑनर्स में एडमिशन लिया और इसी दौरान ट्यूशन भी पढ़ाते रहे.
2006 में जिंदगी ने ली करवट
मनोज गर्ग ने बताया कि 2006 में उनकी बड़ी बहन की शादी थी. बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस वक्त बहन की शादी की थी. क्योंकि तब बहन को गिफ्ट में देने के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे. मां भी लोगों की साड़ी में फॉल लगाने का काम करती थी. वहां से 1500 या फिर 2000 के आसपास कमाई होती थी. बहन भी ट्यूशन पढ़ाती थी और जब बहन की शादी हो गई, तब एक चिंता यह थी की बहन चली जाएगी तो घर का खर्चा कैसा चलेगा लेकिन वहीं से इनकी किस्मत ने करवट ले ली.
9वीं और 10वीं के बच्चों को इन्होंने मैथमेटिक्स पढ़ाना शुरू किया. एक कोचिंग सेंटर ने उन्हें ऑफर दिया था. वहां पर 18 से 20 बच्चे थे. इसके बाद 11वीं और 12वीं के बच्चों को अकाउंट पढ़ाया. 2009 में एक बड़े कोचिंग संस्थान ने इन्हें अपने यहां पढ़ाने का ऑफर दिया. जो कि जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट बना. इस कोचिंग संस्थान ने इनको लाखों की सैलरी ऑफर की थी.
बच्चों को बनाया आईएएस-आईपीएस
मनोज गर्ग ने बताया कि उनके पढ़ाए हुए बच्चे आज देश और दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं. उनका एक स्टूडेंट वर्ल्ड बैंक में है. इसके अलावा हजारों बच्चे आज आईपीएस, आईएएस और आईआरएस बन चुके हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए 40 कॉलेज हैं. 40 में से 23 कॉलेज ऐसे हैं, जिसमें उनके स्टूडेंट्स आज असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नौकरी कर रहे हैं. पहले दिल्ली में उनके चार कोचिंग सेंटर चलते थे. अब सिर्फ दो चलते हैं. मनोज गर्ग ने बताया कि अब वह ऑफलाइन ही पढ़ाते हैं. उन्होंने कहा कि जिंदगी में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए. अगर आप लगातार लगे रहेंगे तो सफलता आपके कदम जरूर चूमेगी.
