Last Updated:
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी 21 अगस्त को कोलकाता में होने वाले अखिल भारतीय इमाम-मुअज्जिन सामाजिक और कल्याण संगठन की सभा में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगी. इस कार्यक्रम में राज्य भर की मस्जिदों से अजान देने वाले इमामों और मुअज्जिनों के शिरकत करने की उम्मीद है.
बंगाल में अल्पसंख्यकों की आबादी राज्य का 30 फीसद है, जो 2009 से ही टीएमसी का एक बड़ा वोट बैंक है. (PTI File)
कोलकाता. 2024 में होने वाले आम चुनाव के चलते सभी राज्यों में नेताओं ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. और वे सभी समुदायों को अपने साथ जोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं. इसी के चलते, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी 21 अगस्त को कोलकाता में होने वाले अखिल भारतीय इमाम-मुअज्जिन सामाजिक और कल्याण संगठन की सभा में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगी. इस कार्यक्रम में राज्य भर की मस्जिदों से अजान देने वाले इमामों और मुअज्जिनों के शिरकत करने की उम्मीद है.
News18 से बातचीत में संगठन के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद शफीक ने बताया, ‘हम पिछले दो सालों से कोशिश कर रहे हैं कि ममता बनर्जी मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहें. इस वक्त उनकी मौजूदगी हमारे लिए बहुत मायने रखती है. हम शांति सुनिश्चित करने के तरीकों पर चर्चा करेंगे. मुझे पक्का यकीन है कि उनका भाषण बहुत अहम होगा.’ 2012 में, बनर्जी सरकार ने इमाम और मुअज्जिनों के लिए विशेष अनुदान की घोषणा की थी, जिससे उनको वजीफा दिया गया था. उनकी इस पहल पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सवाल उठाए थे. 2024 के चुनाव से पहले क्या बनर्जी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए कोई विशेष घोषणा करेंगी?
मायने रखते हैं अल्पसंख्यकों के वोट
बंगाल में अल्पसंख्यकों की आबादी राज्य का 30 फीसद है, जो 2009 से ही टीएमसी का एक बड़ा वोट बैंक है. जहां एकतरफ लग रहा था कि यह समर्थन पार्टी के पक्ष में खड़ा हुआ है, ऐसे में सागरदिघी सीट पर हुए उपचुनाव में, जहां पर अल्पसंख्यकों की संख्या 40 फीसद है, कांग्रेस ने टीएमसी को हरा दिया था. यह हार टीएमसी के लिए एक चेतावनी थी. हालांकि बाद में कांग्रेस के विधायक बायरोन बिस्वास ने पाला बदल लिया, लेकिन अल्पसंख्यकों के वोट हासिल नहीं कर पाना टीएमसी के लिए चिंता के तौर पर देखा गया.
किए अल्पसंख्यक सेल में बड़े बदलाव
इसके बाद, बनर्जी और उनके भतीजे टीएमसी महासचिव अभिषेक ने अल्पसंख्यक सेल में बड़े बदलाव किए. हाल के पंचायत चुनावों में, टीएमसी ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की, लेकिन भांगर और मुर्शिदाबाद के अल्पसंख्यक इलाकों में हिंसा और फसाद की घटनाएं सामने आईं. भांगर में अल्पसंख्यक बाहुल्य पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) ने टीएमसी को कड़ी टक्कर दी.
टीएमसी ही अल्पसंख्यकों की पार्टी है!
2021 में, आईएसएफ के अध्यक्ष नौशाद सिद्दीकी ने टीएमसी को हराया था और भांगर से जीत हासिल की थी, जिसके बाद राजनीति के पंडितों ने कई सवाल उठाए थे. वहीं मुर्शिदाबाद में भी, अधीर चौधरी ने टीएमसी से लड़ने के लिए अल्पसंख्यक समर्थन हासिल किया था. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि यह धारणा बन गई है कि अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली एकमात्र पार्टी टीएमसी ही है. एक वरिष्ठ टीएमसी नेता ने News18 को बताया कि, ममता बनर्जी एकमात्र नेता हैं जो सभी लोगों और सभी धर्मों की एकता में विश्वास करती हैं. इसमें कोई राजनीति नहीं है. भाजपा नेता समीक भट्टाचार्य ने कहा कि, चूंकि लोकसभा चुनाव निकट हैं, इसलिए ममता बनर्जी अल्पसंख्यक कार्ड खेलने में लगी हैं.
