रिपोर्ट – अनिन्द्य बनर्जी
नई दिल्ली. विवादास्पद दिल्ली सेवा विधेयक पर सोमवार को मतदान के दौरान राज्यसभा में विपक्ष के भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (I.N.D.I.A.) को 105 वोट मिलने थे, जिसके लिए 90 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह व्हीलचेयर पर आए. हालांकि, जब नतीजे आए तो गठबंधन को 102 वोट मिले थे.
राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) प्रमुख चौधरी जयंत सिंह, समाजवादी पार्टी (एसपी) समर्थित स्वतंत्र उम्मीदवार कपिल सिब्बल और जनता दल-सेक्युलर (जेडीएस) सुप्रीमो और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने वोट नहीं दिया. इसके बाद अब तमाम तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं, और तमाम तरह के राजनीतिक सिद्धांत सामने आ रहे हैं.
रालोद-भाजपा गठबंधन?
जयंत सिंह की गैर-मौजूदगी केवल विपक्षी गुट के लिए वोट के बारे में नहीं है, बल्कि इसके बाद अगले साल लोकसभा चुनाव से पहले संभावित रालोद-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की चर्चा फिर से जीवित हो गई है, जिसे रालोद प्रमुख ने पहले ही शांत कर दिया था. जबकि युवा जाट नेता ने उपस्थित नहीं होने की वजह कुछ अपरिहार्य कारणों को बताया है. लेकिन इसने निश्चित तौर पर विपक्षी गुट को असहज कर दिया है. इससे पहले-उत्तर प्रदेश में दलितों में पैठ रखने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) पहले ही गुट में नहीं है. देश के सबसे बड़े राज्य से किसी का नहीं होना या किसी को खोना I.N.D.I.A. यह कतई नहीं चाहेगा.
इसके अलावा, आग में घी डालने का काम भाजपा की हालिया ‘टीम नड्डा’ की घोषणा ने किया, जहां जाटों को छोड़कर लगभग सभी समुदायों – वैश्य, पिछड़ा, ठाकुर, ब्राह्मण, मुस्लिम – को प्रतिनिधित्व मिला. जाट राज्य की 20 करोड़ आबादी का केवल 2% हैं, लेकिन अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 25 निर्वाचन क्षेत्रों की बात की जाए तो यहां वह 30% से 35% आबादी का गठन करते हैं, जिसकी वजह से उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. व्यापक धारणा यह है कि भाजपा को इस बात का भरोसा है कि चौधरी, जो अपने दादा चौधरी चरण सिंह की विरासत संभाल रहे हैं और अपने समुदाय पर पकड़ रखते हैं, आगामी आम चुनावों में भाजपा का साथ देंगे.
सिब्बल का कांग्रेस से रिश्ता
पिछले साल कांग्रेस से बाहर निकलने के बाद कपिल सिब्बल ने निर्दलीय सांसद होने के बावजूद सपा के समर्थन से राज्यसभा सीट जीती थी. कांग्रेस छोड़ने पर सिब्बल ने कहा था, ‘आप सोच रहे होंगे कि 31 साल बाद कोई कांग्रेस कैसे छोड़ सकता है. कुछ तो बात होगी. कभी-कभी ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं.’ सिब्बल कांग्रेस के विद्रोही समूह जी-23 का चेहरा थे और उनका बाहर जाना एक कड़वाहट भरा अनुभव था, कई लोगों का मानना है कि दरार अभी तक ठीक से भरी नहीं है.
दूसरी ओर, उच्च सदन से सिब्बल की अनुपस्थिति अखिलेश यादव पर सवाल खड़ा करती है, जिनकी पार्टी दिल्ली सेवा विधेयक के मुद्दे पर विपक्षी गुट के साथ खड़ी थी. विशेष रूप से, सिब्बल उस दिन अनुपस्थित थे जबकि यादव की पत्नी डिंपल लोकसभा में मौजूद थीं.
देवेगौड़ा की मोदी से नजदीकियां
देवेगौड़ा भी अनुपस्थित थे, उन्होंने खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया. सोमवार को आनन फानन में जारी एक प्रेस नोट में कहा गया कि उनके कूल्हे में दर्द है जिस वजह से वह ज्यादा देर तक बैठने में असमर्थ हैं. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि इसमें यह भी कहा गया है कि अगर उनका दर्द कम हो गया तो वह बुधवार से वापसी करेंगे. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद देवेगौड़ा और पीएम मोदी के बीच घनिष्ठ संबंध हैं. 2021 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, देवेगौड़ा ने पीएम मोदी के प्रति अपना सम्मान सार्वजनिक किया था. देवेगौड़ा ने उनसे कहा था कि अगर आप 276 सीटें जीतेंगे तो मैं इस्तीफा दे दूंगा. आप दूसरों के साथ गठबंधन बनाकर शासन कर सकते हैं, लेकिन अगर आप अपने दम पर 276 सीटें जीतते हैं, तो मैं (लोकसभा से) इस्तीफा दे दूंगा.
Prime Minister Narendra Modi met former PM HD Devegowda in Parliament today.
