Gymkhana Club News: दिल्ली का जिमखाना क्लब सिर्फ एक एलीट क्लब नहीं है. यह सत्ता, विरासत और विवाद का ऐसा संगम बन चुका है जिसकी फाइलें सात दशक से सरकारी दफ्तरों में घूम रही हैं. आज जब केंद्र सरकार ने क्लब को लेकर फिर सख्त रुख अपनाया है तो पुराने दस्तावेज भी सामने आने लगे हैं. इन कागजों से पता चलता है कि जिमखाना क्लब और सरकार के बीच टकराव कोई नया नहीं बल्कि करीब 70 साल पुराना है. 1956 में पहली बार सरकार ने क्लब को नोटिस भेजा था. आरोप था कि परिसर में बिना अनुमति निर्माण किया गया है. तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह विवाद दशकों तक खिंचेगा और हर कुछ साल बाद क्लब पर नए सवाल खड़े होंगे. कभी अवैध दुकानों को लेकर मामला उठा तो कभी प्रधानमंत्री आवास के पास सुरक्षा खतरे का मुद्दा सामने आया. कई बार नोटिस जारी हुए, जुर्माना लगा, निर्माण तोड़े गए और समझौते भी हुए. लेकिन विवाद पूरी तरह कभी खत्म नहीं हुआ. अब जब दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित क्लबों पर सरकारी नजर और सख्त होती दिख रही है तो जिमखाना क्लब का पुराना इतिहास फिर चर्चा में है.
दिल्ली जिमखाना क्लब की कहानी सिर्फ अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है. इसमें सत्ता के गलियारों से लेकर सुरक्षा एजेंसियों तक की चिंता शामिल रही है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 2000 के दशक में प्रधानमंत्री आवास के पास मौजूद क्लब के स्टाफ क्वार्टर्स को बड़ा सुरक्षा खतरा बताया गया था. दिल्ली पुलिस ने तक कह दिया था कि ये इलाके ‘सबसे संभावित खतरे वाले क्षेत्र’ हैं. इसके बाद सरकार ने 1.99 एकड़ जमीन दोबारा अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू की. मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा लेकिन आखिरकार समझौते के जरिए स्टाफ क्वार्टर्स हटाए गए और इलाके को ग्रीन बेल्ट में बदला गया. क्लब ने लाखों रुपए का जुर्माना भी भरा. दिलचस्प बात यह है कि हर बार विवाद सुलझा जरूर लेकिन कुछ सालों बाद नया विवाद सामने आ गया. यही वजह है कि आज जिमखाना क्लब को लेकर उठ रहे सवालों के पीछे सात दशक पुराना इतिहास खड़ा दिखाई देता है.
जिमखाना क्लब को पहला सरकारी नोटिस 1956 में मिला था.
जिमखाना क्लब विवाद का पूरा इतिहास
- दिल्ली जिमखाना क्लब और केंद्र सरकार के बीच विवाद की शुरुआत 1956 में हुई थी. उस समय भूमि एवं विकास कार्यालय यानी L&DO ने क्लब को पहला नोटिस भेजा. इसमें क्लब परिसर के भीतर अनधिकृत निर्माण हटाने के निर्देश दिए गए थे. इसके बाद आने वाले दशकों में नोटिसों की संख्या बढ़ती गई. क्लब परिसर में बनी दुकानों, स्टोर और अन्य ढांचों को लेकर सरकार लगातार सवाल उठाती रही.
- सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि क्लब ने खुद एक पत्र में स्वीकार किया था कि समय-समय पर उसे कई और नोटिस मिले जिनमें अवैध निर्माण हटाने को कहा गया. लेकिन लंबे समय तक इन मामलों का पूरा समाधान नहीं हो पाया. इसी वजह से 2000 में L&DO ने शांतिपूर्ण कब्जा लेने तक का आदेश जारी कर दिया था.
- 2004 में क्लब ने करीब 74.22 लाख रुपए का जुर्माना भरा. इसमें 38.16 लाख रुपए अवैध निर्माण के लिए थे. इसके अलावा ‘एम्पायर स्टोर’ और ‘जंबो शॉप’ चलाने को लेकर भी अलग-अलग पेनल्टी लगाई गई. बाद में क्लब ने कहा कि उसने रेगुलराइजेशन चार्ज जमा कर दिए हैं और दिल्ली हाईकोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है.
अवैध दुकानों से बढ़ा था विवाद
- जिमखाना क्लब के भीतर बने ‘एम्पायर स्टोर’ और ‘जंबो शॉप’ उस दौर में सबसे बड़े विवादों में शामिल रहे. सरकार का आरोप था कि क्लब परिसर का व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है. 1980 में एम्पायर स्टोर तोड़ा गया जबकि 2001 में जंबो शॉप बंद करवाई गई.
- सरकारी पत्राचार में साफ लिखा गया कि क्लब ने न तो समय पर निर्माण हटाए और न ही जुर्माना भरा. सितंबर 2000 में L&DO ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि लीज डीड के तहत पूरी जमीन और उस पर मौजूद सभी संरचनाएं सरकार के अधिकार में आ सकती हैं. यह बयान उस समय काफी चर्चा में रहा था.
पीएम आवास की सुरक्षा भी बनी थी बड़ा मुद्दा
2001-2002 में विवाद ने नया मोड़ लिया जब प्रधानमंत्री आवास के पास मौजूद क्लब की 1.99 एकड़ जमीन को लेकर सुरक्षा चिंताएं सामने आईं. दिल्ली पुलिस ने इसे बड़ा खतरा बताया. एक गोपनीय पत्र में कहा गया कि क्लब परिसर में बने 150 से ज्यादा सर्वेंट क्वार्टर्स प्रधानमंत्री आवास के बेहद करीब हैं और यह “संभावित खतरे वाले इलाके” हैं.
यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा लेकिन बाद में समझौते के जरिए हल निकाला गया. क्लब कर्मचारियों को दिल्ली के बाहरी इलाके मोलरबंद में वैकल्पिक जमीन दी गई. क्लब ने करीब 81.88 लाख रुपए देकर पुनर्वास परियोजना पूरी कराई और उस इलाके को ग्रीन बेल्ट में बदला गया.
सरकार और क्लब के बीच कैसे हुआ समझौता?
पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विकास सिंह के मुताबिक उस समय भी प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया था लेकिन मामला आपसी सहमति से सुलझा लिया गया. क्लब ने स्टाफ क्वार्टर्स हटाने पर सहमति दी और सरकार ने वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराई.
दिलचस्प बात यह है कि 2009 में L&DO ने आखिरकार ‘री-एंट्री ऑर्डर’ वापस ले लिया. यानी सरकार ने क्लब के खिलाफ कब्जा लेने की कार्रवाई रोक दी. लेकिन इतने वर्षों के विवाद ने यह साफ कर दिया कि जिमखाना क्लब और सरकार के रिश्ते हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं.
जिमखाना क्लब को पहला सरकारी नोटिस कब मिला था?
जिमखाना क्लब को पहला सरकारी नोटिस 1956 में मिला था. यह नोटिस भूमि एवं विकास कार्यालय यानी L&DO ने भेजा था. इसमें क्लब परिसर के भीतर बने कथित अनधिकृत निर्माण हटाने के निर्देश दिए गए थे. यही विवाद बाद में कई दशकों तक चलता रहा.
जिमखाना क्लब पर सबसे बड़े आरोप क्या थे?
क्लब पर अवैध निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियां चलाने और प्रधानमंत्री आवास के पास सुरक्षा खतरा पैदा करने जैसे आरोप लगे. “एम्पायर स्टोर” और “जंबो शॉप” को लेकर सरकार ने कई बार कार्रवाई की. बाद में स्टाफ क्वार्टर्स को भी सुरक्षा कारणों से हटाया गया.
क्या सरकार कभी क्लब की जमीन अपने कब्जे में लेने वाली थी?
हां, 2000 में L&DO ने ‘शांतिपूर्ण कब्जा’ लेने तक का आदेश जारी कर दिया था. सरकार ने कहा था कि लीज शर्तों के उल्लंघन के कारण जमीन वापस ली जा सकती है. हालांकि बाद में जुर्माना जमा होने और समझौते के बाद कार्रवाई रोक दी गई.
