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दिल्ली का 33 शाम नाथ मार्ग एक ऐसा बंगला है, जिसे कभी मनहूस तो कभी भूतिया कहा गया. हां एक बात तो सच है, जो भी इस बंगले में रहने गया, उसका भला तो नहीं हुआ. इस बंगले की कथित मनहूसितय ने कई को राज से रंक बना दिया. आइए आपको बताते हैं दिल्ली के ‘मनहूस’ बंगलू की पूरी कहानी…
दिल्ली के सिविल लाइंस स्थित 33 शाम नाथ मार्ग का सरकारी बंगला वर्षों से ‘मनहूस’ पते के रूप में चर्चित रहा है. चौधरी ब्रह्म प्रकाश से लेकर मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और अन्य नेताओं के साथ जुड़े विवादों और घटनाओं ने इस बंगले की रहस्यमयी छवि को मजबूत किया.
क्यों कहा जाता है 33 शाम नाथ मार्ग को ‘मनहूस’ बंगला?: दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में स्थित 33 शाम नाथ मार्ग का सरकारी बंगला वर्षों से राजनीतिक गलियारों में ‘मनहूस’ पते के रूप में चर्चा में रहा है. इस बंगले में रहने या यहां से काम करने वाले कई नेताओं और अधिकारियों का कार्यकाल अचानक विवादों, इस्तीफों सहित अन्य मुश्किलों से घिर गया. यही वजह है कि समय के साथ इस बंगले को लेकर तरह-तरह की कहानियां और धारणाएं फैलती चली गईं.
पहले मुख्यमंत्री के कार्यकाल पर भी लगा था विराम: इस बंगले में रहने वाले पहले व्यक्ति दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश थे. वह 1952 में यहां रहने आए थे. लेकिन 1955 में कथित ‘गुड़ घोटाले’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया और उनका कार्यकाल समय से पहले समाप्त हो गया. वर्षों बाद, लोगों ने इस घटना को भी बंगले की मनहूसियत से जोड़कर देखना शुरू कर दिया.
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मदन लाल खुराना के इस्तीफे के बाद जुड़ गई एक नई कहानी: करीब चार दशक बाद 1993 में मुख्यमंत्री बने मदन लाल खुराना को यह बंगला आवंटित किया गया. लेकिन उनका कार्यकाल भी ज्यादा लंबा नहीं चला. हवाला मामले में नाम आने के बाद उन्हें 1996 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. लगातार दूसरे मुख्यमंत्री के साथ भी ऐसी स्थिति बनने पर राजनीतिक हलकों में इस बंगले को लेकर मनहूसियत की चर्चा तेज हो गई.
साहिब सिंह वर्मा भी नहीं कर पाए अपना कार्यकाल पूरा: मदन लाल खुराना के बाद मुख्यमंत्री बने साहिब सिंह वर्मा ने इस बंगले का इस्तेमाल अपने कैंप ऑफिस के तौर पर किया. हालांकि वह भी अपना पूरा कार्यकाल नहीं पूरा कर सके. बाद में, उनकी जगह सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस घटना को भी लोग इसी मनहूसियत का हिस्सा मानने लगे, जिससे बंगले की रहस्यमयी छवि और भी मजबूत हो गई.
दीप चंद बंधु की मौत ने और बढ़ाया रहस्य: साल 2003 में दिल्ली सरकार के मंत्री रहे दीप चंद बंधु ने सहयोगियों की सलाह के बावजूद इस बंगले में रहने का फैसला किया. कुछ समय बाद उन्हें मेनिन्जाइटिस हो गया और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इस घटना के बाद बंगले को लेकर पहले से चल रही बातों को सच माने जाने लगा. कई लोगों ने इस बात को पूरी तरह से सच मान चुके थे कि यह बंगला मनहूस ही नहीं भूतिया भी है.
शीला दीक्षित समेत कई नेताओं ने बनाई दूरी: लगातार सामने आई घटनाओं और अफवाहों के कारण बाद के कई मुख्यमंत्रियों ने इस बंगले में रहने से परहेज किया. पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी इसे अपना आधिकारिक आवास नहीं बनाया. धीरे-धीरे यह बंगला एक सरकारी संपत्ति से ज्यादा राजनीतिक किस्सों और अंधविश्वासों का विषय बन गया. लंबे समय तक इसका उपयोग भी सीमित ही रहा.
जैस्मीन शाह प्रकरण ने फिर बटोरी सुर्खियां: इस परिसर से काम करने वाले आखिरी अधिकारी दिल्ली डायलॉग कमीशन के तत्कालीन वाइस चेयरपर्सन जैस्मीन शाह थे. नवंबर 2022 में उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उन्हें पद से हटाने का निर्देश दिया था. उन पर अपने पद का राजनीतिक इस्तेमाल करने के आरोप लगे थे. इस घटना को भी बंगले से जुड़ी मनहूसियत से जोड़ा गया.
ब्रिटिश दौर की भव्य इमारत रहा है यह बंगला: यह दो मंजिला बंगला 1920 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था. करीब 5,500 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले इस परिसर में बड़े लॉन, खूबसूरत बगीचे, कॉन्फ्रेंस रूम और स्टाफ क्वार्टर मौजूद हैं. आजादी के बाद विधानसभा के करीब होने के कारण इसे मुख्यमंत्री आवास के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा और यह दिल्ली की महत्वपूर्ण सरकारी संपत्तियों में शामिल हो गया.
दो दशकों से अधिक समय तक लगभग खाली रहा परिसर: विवादों और अंधविश्वासों के चलते इस बंगले का उपयोग धीरे-धीरे कम होता गया. कई वर्षों तक यह परिसर पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं किया गया. सरकारी स्तर पर भी इसे किसी बड़े प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित नहीं किया जा सका. नतीजतन इतनी महत्वपूर्ण जमीन लंबे समय तक सीमित उपयोग में ही रही.
अब बदलने जा रही है इस पते की पहचान: दिल्ली सरकार ने अब इस बंगले को नए रूप में विकसित करने का फैसला किया है. इसके तहत पुरानी इमारत को हटाकर आधुनिक सुविधाओं वाला नया परिसर तैयार किया जाएगा. अधिकारियों का मानना है कि इससे वर्षों से विवादों और कहानियों में घिरे इस पते को नई पहचान मिलेगी और इसका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जा सकेगा.
आपदा प्रबंधन के लिए बनेगा आधुनिक केंद्र: सरकार की योजना के अनुसार यहां दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (DDMA) का समर्पित मुख्यालय बनाया जाएगा. इसके साथ एक अत्याधुनिक इमरजेंसी ऑपरेशन्स सेंटर (EOC) भी स्थापित किया जाएगा. वर्तमान में आपदा प्रबंधन से जुड़े कई काम अलग-अलग दफ्तरों से संचालित होते हैं, लेकिन नया केंद्र बनने के बाद सभी गतिविधियों का बेहतर समन्वय संभव हो सकेगा.
दिल्ली की आपदा में कर सकेंगे बेहतर काम: प्रस्तावित मुख्यालय में दिल्ली पुलिस, फायर सर्विस, नई दिल्ली नगर परिषद, दिल्ली विकास प्राधिकरण और अन्य एजेंसियों के प्रतिनिधि एक साथ काम कर सकेंगे. अधिकारियों के मुताबिक इससे किसी भी आपदा या आपात स्थिति में क्विक एक्शन देने में मदद मिलेगी. इस तरह वर्षों तक ‘मनहूस’ कहे जाने वाले इस पते को अब राजधानी की आपदा प्रबंधन व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में नई भूमिका मिलने जा रही है.
33 शाम नाथ मार्ग का ‘मनहूस’ बंगला दशकों से विवादों, अधूरे कार्यकालों और अंधविश्वासों से घिरा रहा. चौधरी ब्रह्म प्रकाश, मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा सहित कई नेता यहां टिक नहीं पाए. एक मंत्री की मौत हुई तो शीला दीक्षित ने दूरी बना ली. जैस्मीन शाह को पद से ही हटा दिया गया. लेकिन अब दिल्ली सरकार इस ऐतिहासिक संपत्ति को आधुनिक आपदा प्रबंधन मुख्यालय में बदल रही है. पुरानी मान्यताओं से ऊपर उठकर यह बंगला अब दिल्ली की सुरक्षा, राहत और बचाव व्यवस्था की नई ताकत बनने जा रही है.
