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Miranda House: दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज के शिक्षकों और रिसर्च टीम ने एक खास हाइड्रोजन सेंसर विकसित किया है. यह सेंसर हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तुरंत पता लगाकर लोगों को अलर्ट कर देगा. मिरांडा हाउस के फिजिक्स विभाग की शिक्षिका मोनिका ने बताया कि इस रिसर्च पर टीम के रूप में काम किया गया है. रिसर्च टीम में अंजलि, हिंदू कॉलेज की रीमा, आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज के अर्जित चौधरी सहित कई अन्य सहयोगी शामिल रहे.
भविष्य में हाइड्रोजन गैस को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारियां तेज हो रही हैं. ऐसे में अगर कहीं हाइड्रोजन गैस लीक हो जाए तो बड़ा हादसा हो सकता है. इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज के शिक्षकों और रिसर्च टीम ने एक खास हाइड्रोजन सेंसर विकसित किया है. यह सेंसर हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तुरंत पता लगाकर लोगों को अलर्ट कर देगा.
मिरांडा हाउस के फिजिक्स विभाग की शिक्षिका मोनिका ने बताया कि इस रिसर्च पर टीम के रूप में काम किया गया है. रिसर्च टीम में अंजलि, हिंदू कॉलेज की रीमा, आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज के अर्जित चौधरी सहित कई अन्य सहयोगी शामिल रहे.
दो तरह के सेंसर तैयार किए गए हैं शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन गैस को मापने के लिए दो प्रकार के सेंसर बनाए है. पहला सेंसर क्वांटिटेटिव है, जो यह बताता है कि सेंसर के आसपास हाइड्रोजन गैस की कितनी मात्रा मौजूद है. इसके जरिए गैस की मात्रा ppm (पार्ट्स पर मिलियन) में मापी जा सकती है.
दूसरा सेंसर सुरक्षा को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है. जब आसपास हाइड्रोजन गैस की मात्रा सामान्य स्तर से अधिक हो जाती है, तो यह सेंसर तुरंत आवाज़ यानी बजर के जरिए अलर्ट देता है, जिससे किसी बड़े हादसे को रोका जा सकता है.
बाजार में मिलने वाले सेंसर से कैसे अलग है
प्रोफेसर मोनिका तोमर के अनुसार, बाजार में उपलब्ध ज्यादातर सेंसर विदेशों, खासकर चीन से आयात किए जाते हैं. जबकि मिरांडा हाउस का यह सेंसर पूरी तरह भारत में बनाया गया है. विशेष बात यह है कि कॉलेज की रिसर्च लैब में थिन फिल्म टेक्नोलॉजी की मदद से इस सेंसर को शुरू से अंत तक तैयार किया गया है. सेंसर की फैब्रिकेशन से लेकर पैकेजिंग तक का पूरा काम शोधकर्ताओं ने खुद किया है.
4 से 5 साल की मेहनत के बाद सफलता
रिसर्च टीम पिछले 15 साल से सेंसर टेक्नोलॉजी पर काम कर रही है. खास तौर पर इस हाइड्रोजन सेंसर को विकसित करने में लगभग 4 से 5 साल लगे. टीम का कहना है कि आने वाले समय में हाइड्रोजन ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने की संभावना है. ऐसे में गैस लीक होने से होने वाले हादसों को रोकने के लिए पहले से सुरक्षा व्यवस्था तैयार करना जरूरी था.
कैसे काम करता है यह सेंसर
यह सेंसर साधारण कंडक्टोमेट्रिक सिद्धांत पर आधारित है. जब हाइड्रोजन गैस सेंसर के पास पहुंचती है तो सेमी-कंडक्टिंग थिन फिल्म की रेजिस्टेंस बदल जाती है. इसके साथ ही इलेक्ट्रिकल पैरामीटर्स में भी बदलाव आता है, जिसे वैज्ञानिक मॉनिटर करते हैं. इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर सेंसर गैस की मौजूदगी और उसकी मात्रा का पता लगा लेता है. यह स्वदेशी तकनीक न केवल ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देगी, बल्कि भविष्य में हाइड्रोजन आधारित वाहनों और उद्योगों की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
