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IIT की एक नई स्टडी में पता चला है कि दिल्ली में बढ़ते एयर पॉल्यूशन से हुमायूं के मकबरे को नुकसान पहुंच रहा है. मकबरे पर ब्लैक क्रस्ट जमा हो रहे हैं, जो इसकी इमारत को कमजोर कर रहे हैं. लेकिन यह अकेली ऐसी हेरिटेज साइट नहीं है जो खतरे में है. जानिए पॉल्यूशन दिल्ली और आस-पास के ऐतिहासिक स्मारकों को कैसे प्रभावित कर रहा है.
दिल्ली-एनसीआर में एयर पॉल्यूशन अब सिर्फ़ पब्लिक हेल्थ इशुज तक सीमित नहीं रह गया है. यह दिल्ली की ऐतिहासिक स्मारकों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है. IIT रुड़की और IIT कानपुर की एक ज्वॉइंट रिपोर्ट सामने आई है, है जो चौंकाने वाली है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एयर पॉल्यूशन का असर सिर्फ दिल्ली-एनसीआर में रहने वालों पर ही नहीं, बल्कि यहां स्थित स्मारकों पर भी पड़ रहा है. इस स्टडी में पाया गया है कि सालों तक प्रदूषित हवा में रहने से हुमायूं के मकबरे पर एक नुकसानदायक काली परत (Black Crust) बन गई है. UNESCO की यह वर्ल्ड हेरिटेज साइट बहुत तेजी से खराब होती जा रही है. एयर पॉल्यूशन धीरे-धीरे दिल्ली और आस-पास के शहरों में कई हेरिटेज इमारतों को नुकसान पहुंचा रहा है. (फाइल फोटो)
‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ आर्किटेक्चरल हेरिटेज’ में प्रकाशित इस स्टडी में हुमायूं के मकबरे के अलग-अलग हिस्सों से लिए गए काली परत (ब्लैक क्रस्ट) के सैंपल का एनालिसिस किया गया. इसके लिए एडवांस्ड लेबोरेटरी तकनीकों का इस्तेमाल करके उनके केमिकल कंपोज़िशन, मिनरल कंटेंट और माइक्रोस्कोपिक स्ट्रक्चर की जांच की गई. रिसर्चर्स में पता चला कि ब्लैक क्रस्ट मुख्य रूप से जिप्सम से बनी है. यह मिनरल तब बनता है जब प्रदूषित हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड कैल्शियम-युक्त धूल और नमी के साथ रिएक्शन करता है. (फाइल फोटो)
जिप्सम की यह परत कालिख, सड़क की धूल, कंस्ट्रक्शन की धूल, गाड़ियों से निकलने वाले धुएं के बारीक मेटल कण, बायोमास जलाने से बचे अवशेष और इंडस्ट्रियल पॉल्यूटेंट्स को जमा करती रहती है. ये जमाव धीरे-धीरे हुमायूं के किले के बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) की सतह पर एक काली कोटिंग बना लेते हैं. स्टडी में यह भी बताया गया कि स्मारक के उन हिस्सों पर परत सबसे मोटी थी जहां बारिश का पानी नहीं पड़ता, क्योंकि वहां लंबे समय तक पॉल्यूटेंट्स जमा होते रहते हैं. इसके उलट, बारिश से भीगने वाली जगहों पर ब्लैक क्रस्ट कम मोटा था क्योंकि बारिश कुदरती तौर पर कुछ पॉल्यूटेंट्स को धो देती है. (फाइल फोटो)
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ब्लैक क्रस्ट चिंता का विषय क्यों है? रिसर्चर्स के मुताबिक, काली परत सिर्फ़ देखने में खराब लगने वाला दाग नहीं है. इसके बनने में शामिल केमिकल रिएक्शन धीरे-धीरे बलुआ पत्थर को कमज़ोर कर देते हैं, जिससे वह मौसम की मार, सतह के कटाव, दरारें पड़ने और लंबे समय में स्ट्रक्चरल खराबी हो जाती है. ये नतीजे एयर पॉल्यूशन और हुमायूं के मकबरे के खराब होने के बीच सीधा संबंध दिखाने वाले वैज्ञानिक सबूत देते हैं और इससे संरक्षण अधिकारियों को ज़्यादा असरदार रेस्टोरेशन रणनीतियां बनाने में मदद मिल सकती है. (फोटो साभारः फेसबुक @NizamuddinRenewal)
हालांकि, यह सिर्फ़ हुमायूं के मकबरे की बात नहीं है. एक्सपर्ट्स ने बार-बार चेतावनी दी है कि दिल्ली और आस-पास के इलाकों में कई मशहूर स्मारकों पर पॉल्यूशन से होने वाले नुकसान के लक्षण दिख रहे हैं. हाल की वैज्ञानिक जांचों में लाल किले की बलुआ पत्थर की दीवारों पर भी ऐसी ही काली परतें बनने की बात सामने आई है. रिसर्चर्स ने जिप्सम के जमाव के साथ-साथ लेड, जिंक, कॉपर और निकेल जैसी ज़हरीले एलिमेंट्स की पहचान की है, जो गाड़ियों से निकलने वाले धुएं, इंडस्ट्रियल प्रदूषण और कंस्ट्रक्शन की धूल से जुड़ी हैं. ये पत्थर की परतें उखड़ने, नमक के क्रिस्टल बनने, नमी से होने वाले नुकसान और स्मारक के धीरे-धीरे खराब होने का कारण बनते हैं. (फोटो साभारः फेसबुक @NizamuddinRenewal)
हालांकि ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया’ की नियमित संरक्षण कोशिशों से कुतुब मीनार सुरक्षित है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली के प्रदूषित शहरी माहौल में होने के कारण, इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए लगातार पर्यावरण की निगरानी ज़रूरी है. इन स्मारकों को कैसे बचाया जा सकता है? IIT की स्टडी में प्रदूषण से होने वाले नुकसान को धीमा करने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं, जैसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित संरक्षण तकनीकों का इस्तेमाल करके समय-समय पर काली परत को हटाना और विरासत स्थलों के आस-पास वायु प्रदूषण की लगातार निगरानी करना. (फाइल फोटो)
इसके अलावा, स्मारकों पर सुरक्षात्मक कोटिंग लगाने से पहले उनकी सावधानीपूर्वक जांच करने का सुझाव दिया गया है. साफ़-सुथरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम और कम प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के ज़रिए प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही कम करना भी ज़रूरी है. रिसर्चर्स का कहना है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक स्मारकों को बचाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण के कड़े उपायों के साथ-साथ बचावकारी संरक्षण भी ज़रूरी होगा. (फाइल फोटो)
दिल्ली में UNESCO की तीन- हुमायूं का मक़बरा, लाल किला और कुतुब मीनार विश्व धरोहर स्थल हैं. ये भारत के वास्तुशिल्प और सांस्कृतिक इतिहास के अहम अध्यायों को दर्शाते हैं. पास ही, आगरा में स्थित ताजमहल दुनिया के सबसे मशहूर स्मारकों में से एक है और भारत की विरासत का प्रतीक है. ताज़ा नतीजों से पता चलता है कि इन ऐतिहासिक स्थलों को बचाने के लिए न केवल मरम्मत के काम की ज़रूरत है, बल्कि हवा की गुणवत्ता में लगातार सुधार की भी ज़रूरत है, क्योंकि प्रदूषण देश की अनमोल सांस्कृतिक विरासत के लिए लंबे समय से खतरा बना हुआ है. (फाइल फोटो)
प्रदूषण से सबसे ज्यादा नुकसान ताजमहल को हुआ है. दशकों से, पर्यावरणविद् और संरक्षण अधिकारी हवा में मौजूद कणों और इंडस्ट्रियल धुएं के कारण इसके सफ़ेद संगमरमर के पीले पड़ने और रंग बदलने को लेकर चिंता जताते रहे हैं. स्मारक को बचाने के लिए ‘ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन’ (TTZ) बनाया गया था, और अधिकारी आगरा और आस-पास के ज़िलों में हवा की गुणवत्ता की निगरानी का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं ताकि स्मारक पर असर डालने वाले प्रदूषण पर बेहतर नज़र रखी जा सके. (फाइल फोटो)
