नई दिल्ली: आजकल बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं. यह एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें बच्चे के मस्तिष्क का विकास सामान्य बच्चों की तुलना में अलग तरीके से होता है. इस वजह से बच्चे के व्यवहार, संवाद करने की क्षमता और सामाजिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है. इसी विषय पर फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के सीनियर डायरेक्टर एवं न्यूरो और स्पाइन सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. राहुल गुप्ता ने अहम जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि ऑटिज्म मुख्य रूप से आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों से जुड़ा होता है. वहीं, कई मामलों में पर्यावरणीय कारक भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं.
किन कारणों से बढ़ सकता है ऑटिज्म का खतरा
डॉ. राहुल गुप्ता के अनुसार, माता-पिता की अधिक उम्र, समय से पहले बच्चे का जन्म, जन्म के समय कम वजन और गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाली कुछ स्वास्थ्य समस्याएं बच्चे के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकती हैं. ये सभी कारण आगे चलकर ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
क्यों बढ़ रहे हैं ऑटिज्म के मामले
डॉक्टर का कहना है कि पहले की तुलना में अब लोग इस बीमारी के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं. माता-पिता बच्चों की छोटी-छोटी गतिविधियों और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देने लगे हैं. पहले संयुक्त परिवारों में कई बार ऐसे लक्षण सामान्य मानकर नजर अंदाज कर दिए जाते थे. वहीं अब छोटे परिवारों और बढ़ती जागरूकता के कारण ऑटिज्म के मामलों की पहचान शुरुआती दौर में ही हो रही है.
शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, यदि बच्चा लोगों से घुलने-मिलने से बचता है, बातचीत में रुचि नहीं लेता तो ऑटिज्म के संकेत हो सकते हैं. दूसरे लक्ष्णों में स्कूल में पढ़ाई या अन्य गतिविधियों में कमजोर प्रदर्शन करता है. जरूरत से ज्यादा गुस्सा करता है. अपनी साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखता या बार-बार एक जैसा नकारात्मक व्यवहार दोहराता है, तो ये ऑटिज्म के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बिना देरी किए विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
समय पर पहचान क्यों है जरूरी
उन्होंने बताया कि ऑटिज्म की समय रहते पहचान होने पर बच्चे के विकास में काफी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है. शुरुआती चरण में बिहेवियरल थेरेपी, सही मार्गदर्शन, स्पीच थेरेपी, विशेष प्रशिक्षण और परिवार के सहयोग से बच्चे की सामाजिक और व्यवहारिक क्षमताओं में सुधार संभव है. वहीं, यदि पहचान और उपचार में देर हो जाती है, तो सुधार की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं.
इलाज सिर्फ दवाइयों तक सीमित नहीं
डॉ. राहुल गुप्ता ने कहा कि ऑटिज्म का उपचार केवल दवाइयों पर निर्भर नहीं होता. इसके लिए स्पेशल एजुकेशन, डेवलपमेंटल थेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, वोकेशनल ट्रेनिंग जरूरी है. इसके साथ ही, बच्चे की व्यक्तिगत क्षमताओं को पहचानना बेहद जरूरी है. यदि किसी बच्चे की रुचि संगीत, कला, खेल या किसी अन्य क्षेत्र में है, तो उसे उसी दिशा में प्रोत्साहित करना चाहिए. इससे बच्चा अपनी प्रतिभा को निखारने में सक्षम हो सकेगा.
परिवार और समाज की भूमिका सबसे अहम
डॉ. राहुल गुप्ता का कहना है कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को कभी भी बोझ या कमजोर नहीं समझना चाहिए. ऐसे बच्चों को परिवार का प्यार, समाज का सहयोग और सही अवसर मिलना बेहद जरूरी है. सकारात्मक माहौल, उचित मार्गदर्शन और निरंतर सहयोग के जरिए ये बच्चे भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं. साथ ही, जीवन में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकते हैं.
