दिल्ली के डॉक्टरों की काबिलियत का लोहा विदेशी भी मानते हैं, यही वजह है कि जटिल से जटिल बीमारियों के इलाज के लिए वे भारत की तरफ मुड़ जाते हैं. हाल ही में मैक्स स्मार्ट हॉस्पिटल साकेत में पापुआ न्यू गिनी से आए दो भाई-बहन का इलाज किया गया है जो अपनी पीठ पर तरबूज के आकार की सूजन लेकर जीने को मजबूर थे और गंभीर कॉम्प्लेक्स स्पाइनल डिफेक्ट्स से जूझ रहे थे.
ये दोनों बच्चे जन्म से ही एक कॉम्प्लेक्स न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट (एनटीडी) से जूझ रहे थे. यह एक कॉन्जेनिटल कंडीशन है, जिसमें मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड का विकास प्रभावित होता है. पांच और सात साल के इन दोनों बच्चों के शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त था और जन्म से ही दोनों का अपने ब्लैडर पर नियंत्रण नहीं था.
इनमें छोटी मरीज पांच साल की बच्ची मिस हेन्सली थी. इसकी पीठ के निचले हिस्से में तरबूज के आकार (10*12 सेमी) की सूजन थी. इसके कारण वह पीठ के बल नहीं लेट पाती थी और उसे हमेशा करवट में सोना पड़ता था. जांच के बाद स्कोलियोसिस और शरीर के निचले हिस्से में बिलकुल भी संवेदना नहीं होने का पता चला.
दूसरा मरीज उसका सात साल का चचेरा भाई मास्टर फ्रांसिस्को था. उसे रीढ़ की हड्डी में सूजन, रीढ़ में टेढ़ापन, दोनों पैरों में क्लबफुट (पैरों का मुड़ा हुआ होना), बाईं तरफ इंग्वाइनल हर्निया और ब्लैडर पर कंट्रोल न रहने की समस्या थी. इससे पहले दूसरे देश में उसकी सर्जरी हुई थी, जिसके बाद दोनों पैरों की हरकत चली गई थी. 2018 में उसकी वेंट्रिकुलोपेरिटोनियल (वीपी) शंट प्रक्रिया भी हुई थी. यह एक ऐसी सर्जरी है जिसमें दिमाग से पेट तक अतिरिक्त फ्लूइड (तरल पदार्थ) निकालने के लिए एक पतली ट्यूब लगाई जाती है, जिससे दिमाग पर पड़ने वाला दबाव कम होता है.
बीमारी की जटिलता और अपने देश में सर्जरी के विकल्पों की कमी को देखते हुए उनके परिवार विशेषरूप से इलाज के लिए भारत आए और एडवांस्ड न्यूरोसर्जिकल केयर के लिए साकेत स्थित मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल से संपर्क किया.
न्यूरोसर्जरी टीम ने दोनों बच्चों की जांच की. इसकी अगुआई मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभाग के वाइस चेयरमैन एवं हेड और न्यूरो-इंटरवेन्शन यूनिट के हेड डॉ. दलजीत सिंह और न्यूरोसर्जरी कंसल्टेंट डॉ. सिमरनजीत सिंह ने की. विस्तार से जांच के बाद टीम ने दोनों बच्चों की सर्जरी एक ही दिन करने का फैसला किया. सात साल के मरीज के मामले में डॉक्टरों ने माइक्रोस्कोपिक तरीके से खराबी वाले हिस्से को हटाकर उसे रिपेयर किया और फिर स्किन डिफेक्ट को ठीक करने के लिए ‘फ्लैप रोटेशन सर्जरी’ की. वहीं छोटी बच्ची की स्पाइनल लीजन (रीढ़ की हड्डी में गांठ) को हटाने और उसे रिपेयर करने की सर्जरी की गई. सर्जरी के दौरान सैक (थैली) से बहुत ज्यादा सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड के रिसाव को रोकना सबसे बड़ी चुनौती थी.
डॉक्टर दलजीत ने कहा, “ये मामले न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट्स की जटिलता और उनके कारण पैदा होने वाली अलग-अलग स्थितियों को दिखाते हैं. दोनों बच्चों में लकवा और ब्लैडर से जुड़ी समस्याओं जैसे कुछ समान लक्षण थे, लेकिन उनकी हालत के पीछे ही एंब्रायोलॉजिकल वजह पूरी तरह अलग थी. ऐसे मामले में इलाज की सफलता के लिए बारीकी से सर्जरी की योजना बनाने, एडवांस्ड माइक्रो-सर्जिकल तकनीकों और सर्जरी के बाद व्यापक रिहैबिलिटेशन की जरूरत होती है. जल्दी पता चलने और समय पर इलाज शुरू करने से ऐसे मरीजों की जिंदगी की गुणवत्ता में काफी सुधार हो सकता है.”
सर्जरी के बाद दोनों बच्चों की गहन देखभाल और फिजियोथेरेपी की गई. छोटी बच्ची पूरी तरह ठीक होकर अपने जीवन में पहली बार पीठ के बल लेट पाई. वहीं बड़े बच्चे को ठीक होने से पहले घाव वाली जगह (फ्लैप साइट) के एक छोटे से हिस्से के इलाज के लिए अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ी. सर्जरी के बाद, मास्टर फ्रांसिस्को को 10वें दिन और मिस हेन्सली को 8वें दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
प्रेग्नेंसी से पहले की जागरूकता और प्रिवेंटिव केयर के महत्व पर जोर देते हुए डॉ. सिंह ने कहा, “न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट्स जन्म के समय होने वाली सबसे आम समस्याओं में से एक हैं. अक्सर प्रेग्नेंसी से पहले और प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में सही मात्रा में फोलिक एसिड सप्लीमेंट लेकर इनसे बचा जा सकता है. इन मामलों में, दोनों माताओं को फोलिक एसिड सप्लीमेंट नहीं मिला था और प्रेग्नेंसी के दौरान रुटीन अल्ट्रासाउंड जांच में भी इन कमियों का पता नहीं चला था. जागरूकता, प्रेग्नेंसी के काउंसिलिंग और शुरुआती जांच से इन जन्मजात विकारों के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है.”
यह सफल सर्जरी मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत की न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया, रिहैबिलिटेशन और नर्सिंग टीमों की साझा कोशिशों का नतीजा है. ये टीमें जन्म से जुड़ी जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों वाले मरीजों की पूरी केयर और कई तरह के स्पेशलिस्ट्स की मदद से इलाज सुनिश्चित करती हैं.
