'पहले पड़ोसी परिवार होते थे, अब लिफ्ट में भी लोग अजनबी'… दिल्ली की बदलती तस्वीर पर आपका भी दिल छू लेगी ये बात

देश की राजधानी दिल्ली बदल रही है… और इतनी तेजी से बदल रही है कि कई बार हमें इसका एहसास भी नहीं होता. लेकिन कभी-कभी एक तस्वीर या एक पोस्ट हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देती है. सोशल मीडिया पर ऐसी ही एक पोस्ट इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रही है, जिसमें दिल्ली के बदलते चेहरे को बेहद भावुक अंदाज में बयां किया गया है.

प्रसिद्ध ज्योतिषी और टैरो कार्ड श्रुति खरबंदा ने अपने फेसबुक पोस्ट में मोतीनगर स्थित डीएलएफ मिडटाउन की ऊंची-ऊंची इमारतों को देखकर अपनी भावनाएं साझा की हैं. उन्होंने लिखा कि जब उनकी नजर इन करीब 39 मंजिला टावरों पर पड़ी तो लगा जैसे वक्त ने चुपचाप दिल्ली की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी हों. अपने पोस्ट में उन्होंने याद किया कि जिस जगह कभी पुरानी फैक्ट्रियां और इंडस्ट्रियल मिलें हुआ करती थीं, वहां आज आलीशान हाई-राइज टावर खड़े हैं.

साल 2021 में डीएलएफ और सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड GIC ने इस परियोजना की शुरुआत की थी और अब 2026 में यह प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो चुका है. लेकिन यह पोस्ट सिर्फ इमारतों की नहीं, बल्कि बदलती दिल्ली की कहानी कहती है.

‘मिट्टी की सोंधी खुशबू और आंगन की रौनक गायब’

श्रुति लिखती हैं, ‘कहां वो दौर था जब दिल्ली में कोठियों के खुले आंगन दिखते थे. नीम और जामुन के दरख्तों की छांव में दोपहर गुजरती थीं, शाम को छतों पर पतंगें उड़ा करती थीं और पड़ोसियों से दीवार लांघकर बातें हो जाया करती थीं.’

वह लिखती हैं, ‘इस शहर का जमीन से एक सीधा राब्ता था, लेकिन अब यह जगह मिट्टी को छोड़कर आसमान की तरफ भाग रही है. चालीसवें माले की बालकनी से नीचे देखने पर इंसान चींटियों जैसे लगते हैं. वहां हवा तो है, मगर मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और आंगन की रौनक़ पूरी तरह गायब हो चुकी है.’

श्रुति पुराने दौर को याद करते हुए लिखती हैं, ‘पहले यहां हर गली की एक अपनी साख होती थी. लोग पीढ़ियों से एक-दूसरे को जानते थे और सुख-दुख में पूरी कॉलोनी एक साझा आंगन बन जाती थी. मगर आज इन नए हाई-राइज़ टावरों में हज़ारों लोग रहते हुए भी लिफ्ट में महज़ एक अजनबी मुस्कान पर सिमट गए हैं. ऊंची सोसायटियों के लोहे के गेट और बायोमेट्रिक लॉक ने सुरक्षा तो दे दी, लेकिन वो पुरानी बेफ़िक्री और खुलापन छीन लिया.

‘जहां कभी परिंदे बैठते थे, वहां अब क्रेनें खड़ी हैं’

इसके साथ ही वह कहती हैं, ‘अब सुबह की शुरुआत परिंदों की चहचहाहट और दबे पांव आती धूप से नहीं होती. अब तो कंस्ट्रक्शन की मशीनों और कंक्रीट मिक्सर की गूंज से आंख खुलती है. पुरानी यादों से सजी कोठियां टूट रही हैं, नए बिल्डर फ्लोर खड़े हो रहे हैं और जहां कभी परिंदे बैठते थे, वहां अब क्रेनें खड़ी हैं.’

श्रुति ने अपनी यादों में उस दौर को भी ताजा किया, जब कनॉट प्लेस के आसपास दूर से सिर्फ स्टेट्समैन हाउस जैसी कुछ गिनी-चुनी ऊंची इमारतें ही दिखाई देती थीं. आज हालात ऐसे हैं कि दिल्ली का स्काईलाइन पूरी तरह बदल चुका है और आसमान को छूती इमारतें शहर की नई पहचान बनती जा रही हैं. वह लिखती हैं, ‘तरक्की के इस शोर में दिल्ली ने सचमुच अपना वो पुराना, सुकून भरा लिबास उतार दिया है. इसी सोच में डूबे-डूबे अचानक मेरा ध्यान इस बात पर गया कि न जाने कब और कैसे देखते ही देखते यहां इतनी सारी आसमान को छूने वाली इमारतें खड़ी हो गईं. अंदाजा तक नहीं हुआ; वरना एक वो ज़माना था जब कनॉट प्लेस के पास दूर से सिर्फ़ ‘स्टेट्समैन हाउस’ जैसी एकाध ऊंची बिल्डिंग ही नज़र आया करती थी और वही इस शहर का आसमान हुआ करती थी.’

पोस्ट के आखिर में उन्होंने एक ऐसी बात लिखी, जिसने हजारों लोगों को अपनी यादों में लौटा दिया. वह लिखती हैं, ‘कोठी-बंगलों वाली दिल्ली अब अपना रूप बदल रही है… और बहुत तेजी से बदल रही है.’

श्रृति खरबंदा की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर की जा रही है. कोई इसे विकास की कहानी बता रहा है, तो कोई इसे उस दिल्ली की विदाई मान रहा है, जिसकी पहचान कभी खुले आंगन, बड़े पेड़ और पड़ोसियों से गहरे रिश्ते हुआ करते थे.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *