पति के सपने को बनाया मिशन: दिल्ली की विनीता ने दिलाई बिहार की इस कला को राष्ट्रीय पहचान, अब मिला GI टैग

दिल्ली: बिहार के भोजपुर क्षेत्र की पिड़िया कला सिर्फ एक लोक कला नहीं, बल्कि वहां की संस्कृति, परंपरा और भावनाओं का हिस्सा है. यह कला हर साल भाई दूज के मौके पर मनाई जाती है. बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए पूरे एक महीने तक व्रत रखती हैं और घर की दीवारों पर पिड़िया कला बनाती हैं, लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे लोगों की नजरों से ओझल होती चली गई. ऐसे में दिल्ली की रहने वाली विनीता ने इस विलुप्त होती कला को नई पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया और आखिरकार इसे GI यानी कि जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग भी दिला दिया.

प्रकृति के रंगों से बनती है पूरी कला

पिड़िया कला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी भी तरह के केमिकल रंगों का इस्तेमाल नहीं होता है. सबसे पहले दीवार को गोबर और मिट्टी से लीपा जाता है. इसके बाद सेम के पत्तों का रस निकालकर हरा रंग तैयार किया जाता है. वहीं, चावल पीसकर उसका घोल बनाया जाता है, जिससे सफेद रंग की डबल लाइन बनाई जाती है. पूरी कला प्राकृतिक चीजों से तैयार होती है. इसलिए इसे पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता है.

सोरहइया का होता है खास महत्व

इस कला में 16 गोबर के पिंड बनाए जाते हैं, जिन्हें सोरहइया कहा जाता है. इनके बीच दीये जलाए जाते हैं और कई पारंपरिक आकृतियां बनाई जाती हैं. इन आकृतियों के जरिए गांव के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, उनकी जरूरतें और संस्कृति को दिखाया जाता है. यही वजह है कि पिड़िया कला केवल सजावट नहीं, बल्कि लोक जीवन की कहानी भी कहती है.

एक किताब से शुरू हुआ GI टैग तक का सफर

विनीता बताती हैं कि इस कला को पहचान दिलाने की प्रेरणा उन्हें उनके दिवंगत पति भुवनेश्वर भास्कर से मिली. विनीता ने बताया कि उनके पति पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पिड़िया पेंटिंग को गांव की दीवारों से किताबों और अब कैनवस तक पहुंचाया. उन्होंने सबसे पहले 2007 में अपनी किताब, भोजपुरी लोक संस्कृति और परंपरा में पिड़िया पेंटिंग को हाईलाइट किया था. इसके बाद उन्होंने गांव की महिलाओं से इस कला के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाई. महिलाओं से बातचीत की, इसकी परंपरा को समझा और फिर इसे दीवारों से निकालकर कागज और कैनवास पर उतारना शुरू किया.

इसके बाद विनीता इस कला को देशभर की प्रदर्शनियों में लेकर गईं और सोशल मीडिया पर भी लोगों तक पहुंचाया. लगातार कई वर्षों की मेहनत और दस्तावेज तैयार करने के बाद आखिरकार इस कला को GI टैग मिल गया. इससे अब पिड़िया कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल चुकी है.

गीतों के बिना अधूरी मानी जाती है पिड़िया कला

पिड़िया कला सिर्फ चित्र बनाने तक सीमित नहीं है. इस पूरे पर्व के दौरान महिलाएं और लड़कियां हर शाम एक साथ बैठकर पारंपरिक गीत भी गाती हैं. ये गीत भाई-बहन के प्रेम, परिवार और रिश्तों की भावनाओं को दर्शाते हैं. एक महीने तक चलने वाले इस त्योहार में हर दिन गीत गाए जाते हैं और अंत में पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है.

हर परंपरा के पीछे छिपा है एक संदेश

इस पर्व में भोजन बनाने से लेकर पूजा तक हर काम पारंपरिक तरीके से किया जाता है. चावल को सिलबट्टे पर पीसकर उसका घोल तैयार किया जाता है. पूजा में इस्तेमाल होने वाली हर चीज का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है. यही वजह है कि पिड़िया कला को सिर्फ एक चित्रकला नहीं, बल्कि एक संपूर्ण लोक परंपरा माना जाता है.

पति के सपने को विनीता ने बनाया अपनी पहचान

विनीता मानती हैं कि अगर उनके पति ने उन्हें इस कला के बारे में न बताया होता तो शायद वह भी इसके महत्व को कभी नहीं समझ पाती हैं. वह कहती हैं कि आज उन्हें जो भी सफलता मिली है, उसका सबसे बड़ा श्रेय उनके पति को जाता है. GI टैग मिलने के बाद उन्हें सबसे पहले अपने पति की याद आई, क्योंकि इसी सपने को उन्होंने आगे बढ़ाया था.

नई पीढ़ी तक पहुंच रही है भोजपुर की विरासत

GI टैग मिलने के बाद अब पिड़िया कला की पहचान सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही. देशभर के लोग इस कला के बारे में जान रहे हैं. विनीता चाहती हैं कि नई पीढ़ी इस लोक कला को सीखे, समझे और आगे बढ़ाए, ताकि आने वाले समय में यह परंपरा हमेशा जीवित रहे.

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