फ्लैग अंकल की विरासत: 1962 से तिरंगा बना रहा दिल्ली का ये मुस्लिम परिवार, 1500 लोग रोज बनाते हैं 150000 झंडा

नई दिल्ली: जिस तिरंगे को देखकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, उसे बनाने में एक मुस्लिम परिवार की दशकों पुरानी मेहनत शामिल है. साल 1962 में शुरू हुआ यह सफर आज भी उसी जुनून के साथ जारी है. पीढ़ियां बदल गईं, वक्त बदल गया, लेकिन तिरंगा बनाने का यह काम नहीं बदला. आज यह परिवार रोज करीब डेढ़ लाख तिरंगे बना रहा है. जो देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं. स्वतंत्रता दिवस से पहले यहां दिन-रात मशीनों की आवाज सुनाई देती है और हर तरफ नजर आता है तिरंगे का रंग केसरिया, सफेद और हरा.

दिल्ली के सदर बाजार की संकरी गलियों में यह घर ‘फ्लैग अंकल’ यानी अब्दुल गफ्फार का है. जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. दिसंबर 2025 को उनका देहांत हो गया था, लेकिन उनके जाने के बाद भी झंडा बनाने का जुनून, जोश और काम परिवार ने नहीं रोका, बल्कि अब इस काम को उनके छोटे भाई अब्दुल मालिक ने संभाल रखा है. इस दौरान उनसे खास बातचीत की गई.

1962 से बना रहे तिरंगा

अब्दुल मालिक ने बताया कि उनके पिता अब्दुल रहमान ने इस काम को शुरू किया था. 1962 से ही उनके पिता के जाने के बाद बड़े भाई अब्दुल गफ्फार ने इस काम को संभाला. 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान रोज डेढ़ से 2 लाख तक झंडे इस घर में तैयार होते हैं. एक झंडा बनाने में लगभग 10 मिनट का वक्त लगता है. उन्होंने बताया कि उनके बड़े भाई अब्दुल गफ्फार के इंतकाल के बाद अब इस काम को वह संभाल रहे हैं और इस बार अब तक 35 लाख झंडा बनाकर उन्होंने भेज दिया है.

यह 35 लाख का वो ऑर्डर था, जो सरकारी और लोकल स्तर पर उन्हें मिला था. उन्होंने बताया कि अब जब 15 अगस्त में सिर्फ चार दिन बचे हैं तो उनके पास अब वो दुकानदार और खरीदार आ रहे हैं. जो अब आस पास के हैं, जिनको तिरंगा और 15 अगस्त से जुड़े हुए तिरंगे के जो दूसरे आइटम होते हैं उसे यहां से ले जाकर अपने राज्य और अपने शहर में बेचना है. उन्होंने बताया कि पूरे भारत से यहां पर लोग आते हैं. देश का ऐसा कोई कोना नहीं है, जहां से दुकानदार या खरीदार या ऑर्डर उनके पास ना आए.

इस तरह तैयार होता है एक झंडा

अब्दुल मालिक ने बताया कि एक झंडा बनाने में कई प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है. सबसे पहले एक प्लेन कपड़ा लेते हैं. उसकी धुलाई होती है. फिर प्रिंटिंग होती है और कलर को पक्का किया जाता है. फिर उसकी फिनिशिंग होती है. फिर रोलर पर उसको चलाते हैं. फिर कटिंग होती है और उसे अलग-अलग आकार में बनाया जाता है. एक झंडे को बनाने में लगभग 10 मिनट का वक्त लगता है और वर्तमान में उनके अंडर में 1500 से लेकर 1600 लोग काम कर रहे हैं. जो प्रतिदिन डेढ़ से 2 लाख झंडे तैयार कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि तिरंगे को बनाते समय कई तरह की बातों का ख्याल रखते हैं. जैसे इसे बनाते समय यह पैर के नीचे ना आए. जहां इसे रखा जाए वह जगह साफ हो. अच्छी पैकेजिंग में किया जाए. हर एक बातों का विशेष ख्याल रख कर ही इसे बनाते हैं.

प्रधानमंत्री ने दिया था फ्लैग अंकल का नाम

अब्दुल मालिक ने बताया कि उनके बड़े भाई अब्दुल गफ्फार को जब हर घर तिरंगा अभियान चलाया गया था तो उसके तहत कई बड़े आर्डर मिले थे, जिसको उन्होंने समय पर पूरा कर दिया था. तब उनके बड़े भाई अब्दुल गफ्फार के पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था. तब उनको फ्लैग अंकल का नाम दिया गया था. आज तक उनका परिवार फ्लैग अंकल के नाम से मशहूर है. उन्होंने बताया कि तिरंगा सिर्फ तिरंगा ही नहीं है. बल्कि यह हर भारतीय की आन बान शान है. उन्होंने बताया कि पहले पिता फिर बड़े भाई अब वह इस काम को संभाल रहे हैं और उनकी आने वाली जितनी भी जनरेशन हैं, सब तिरंगे को बनाने का काम करेगी.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *