दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में जनता की गाढ़ी कमाई और जन-संसाधनों की बर्बादी का एक खौफनाक सच सामने आया है. करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए अत्याधुनिक मेडिकल उपकरण बिना किसी इस्तेमाल के अस्पतालों के कोनों में धूल फांक रहे हैं. दिल्ली हाईकोर्ट के कड़े रुख और आदेश के बाद जब राजधानी के 26 सरकारी अस्पतालों का विशेष ऑडिट कराया गया तो इस चौंकाने वाली लापरवाही का खुलासा हुआ. दिल्ली सरकार द्वारा 5 अगस्त को हाईकोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे में स्वीकार किया गया है कि कहीं डॉक्टरों और तकनीकी स्टाफ की कमी, कहीं जगह का न होना तो कहीं तकनीकी तालमेल के अभाव में करोड़ों के उपकरण कबाड़ बन रहे हैं. मामले की सुनवाई के दौरान 3 जुलाई को हाईकोर्ट ने इस स्थिति पर सख्त नाराजगी जताते हुए इसे “सार्वजनिक संसाधनों की गंभीर बर्बादी” करार दिया था.
15.4 करोड़ का साइक्लोट्रॉन 4 साल से बंद
अस्पतालों में पड़े बेकार सामानों की फेहरिस्त में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मामला दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट का है. यहां साल 2017 में कैंसर मरीजों की इमेजिंग और रेडियोधर्मी आइसोटोप्स बनाने के लिए करीब 2.5 मिलियन डॉलर (15.42 करोड़) में मेडिकल साइक्लोट्रॉन मशीन खरीदी गई थी. इसके अलावा 64 लाख लोकल सप्लाई और 2.5 करोड़ टर्नकी कॉस्ट पर खर्च किए गए. बेहद दुखद यह है कि यह कीमती मशीन अप्रैल 2022 से पूरी तरह बंद पड़ी है. अस्पताल का कहना है कि मशीन चलाने के लिए आवश्यक मैनपावर (स्टाफ) ही मौजूद नहीं है.
इसी तरह, दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में ही 2017 में करीब 10 करोड़ (1.3 मिलियन डॉलर) से अधिक की लागत से खरीदी गई ‘Dual-Head Gamma Camera with SPECT’, ‘Multislice CT’ और ‘RT Simulation’ मशीन भी इस्तेमाल नहीं हो पा रही है. वहीं, कैंसर के नमूनों की जांच (टिश्यू स्लाइसिंग) के लिए जर्मनी से आया लाखों रुपये का ‘KUGEL Grossing Station’ इसलिए शुरू नहीं हो सका क्योंकि अस्पताल के पास इसे इंस्टॉल करने के लिए जगह ही नहीं थी.
स्टाफ और डॉक्टरों की भारी कमी बनी मुसीबत
अस्पतालों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों और मैनपावर की कमी का आलम यह है कि डॉ. बी.आर. सुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर में ₹19.08 लाख की चालू अल्ट्रासाउंड मशीन सिर्फ इसलिए बंद पड़ी है क्योंकि वहां कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं है. अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट का कोई स्थायी पद तक स्वीकृत नहीं है और अब इसे गेस्ट फैकल्टी के जरिए चलाने का प्रयास किया जा रहा है.
इसी तरह दीन दयाल उपाध्याय (DDU) अस्पताल में Eye Bank शुरू करने के लिए 2019-20 में ₹22.15 लाख के दो मॉडर्न उपकरण (स्पेकेक्युलर माइक्रोस्कोप और लेमिनार एयर फ्लो) खरीदे गए थे, लेकिन ट्रेंड कॉर्निया स्पेशलिस्ट और डॉक्टरों की कमी के चलते ये आज तक चालू नहीं हो सके. इसके अलावा DDU अस्पताल के लैब मेडिसिन विभाग में रीएजेंट्स उपलब्ध न होने के कारण ₹1.26 करोड़ का ‘बायोकैमिस्ट्री एनालाइजर’ बंद हो गया, जिसे अब कंडम (रद्दी) घोषित करने की प्रक्रिया में डाल दिया गया है.
कोविड में आए वेंटिलेटर, ऑक्सीजन टैंक और मॉनिटर्स भी कबाड़
कोरोना महामारी के दौर में दान में मिले और खरीदे गए आपातकालीन उपकरण भी अब उपेक्षा का शिकार हैं. DDU अस्पताल को 2021 में ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ द्वारा ₹94.82 लाख की लागत का ‘मेडिकल ऑक्सीजन बफर टैंक’ दान दिया गया था. अस्पताल की लापरवाही देखिए कि इस टैंक को कभी ‘मेडिकल गैस पाइपलाइन सिस्टम’ (MGPS) से कनेक्ट ही नहीं किया गया. इसके अलावा अस्पताल में ₹2.16 लाख प्रति यूनिट की दर से आए 13 ‘धमन वेंटिलेटर’, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और बायपैप (BiPAP) मशीनें कबाड़ की तरह पड़ी हैं.
यही हाल लोक नायक (LNJP) अस्पताल का भी है, जहाँ कोविड काल में मिले 140 पेशेंट मॉनिटर्स, 180 बायपैप मशीनें और 500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर में से अधिकांश धूल फांक रहे हैं. अस्पताल प्रशासन का तर्क है कि जरूरत पड़ने पर इन्हें अलग-अलग वार्डों में भेजा जाता है.
26 अस्पतालों में एक जैसी प्रशासनिक नाकामी
हाईकोर्ट के निर्देश पर हुए ऑडिट में GTB, LBS, बुरारी अस्पताल, GIPMER/GB पंत, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज और DDU समेत 26 प्रमुख अस्पतालों की रिपोर्ट शामिल है. लगभग हर जगह उपकरणों के इस्तेमाल न होने के पीछे मैनपावर की कमी, स्पेशलिस्ट डॉक्टरों का न होना, रीएजेंट्स की अनुपलब्धता और तकनीकी तालमेल की कमी जैसी वजहें सामने आई हैं.
मामले के मुख्य प्वाइंट
• हाईकोर्ट के आदेश पर ऑडिट: दिल्ली के 26 सरकारी अस्पतालों में बेकार पड़े (Unused) मेडिकल उपकरणों पर हाईकोर्ट में 5 अगस्त को रिपोर्ट दाखिल की गई.
• सार्वजनिक धन की बर्बादी: हाईकोर्ट ने सरकारी संसाधनों के इस तरह पड़े रहने को ‘Gross Waste of Public Resources’ कहा.
• कैंसर मरीजों का नुकसान: दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में ₹15.42 करोड़ का साइक्लोट्रॉन और ₹10 करोड़ से अधिक की इमेजिंग मशीनें बंद हैं.
• जगह की कमी से मशीनें कबाड़: KUGEL जर्मनी का ग्रोसिंग स्टेशन जगह न मिलने के कारण कभी चालू ही नहीं हो पाया.
• रेडियोलॉजिस्ट नहीं, बंद पड़ा अल्ट्रासाउंड: डॉ. बी.आर. सुर अस्पताल में ₹19 लाख का फंक्शनल अल्ट्रासाउंड बिना डॉक्टर के बेकार पड़ा है.
• ऑक्सीजन बफर टैंक कभी जुड़ा ही नहीं: DDU अस्पताल में दान में मिला ₹94.82 लाख का ऑक्सीजन टैंक कभी पाइपलाइन से कनेक्ट नहीं किया गया.
• वेंटिलेटर और मॉनिटर्स धूल फांक रहे: महामारी के बाद DDU और लोक नायक अस्पताल में सैकड़ों वेंटिलेटर, BiPAP और कंसंट्रेटर बंद पड़े हैं.
