नई दिल्ली: 15 अगस्त यानी भारत की आजादी दिवस, जिसे स्वतंत्रता दिवस भी कहते हैं. अगले 3 दिन बाद भारत अपने आजादी का 80वां जश्न मनाएगा. यूं तो आजादी की लड़ाई के निशान पूरे देश के राज्यों में आपको अलग-अलग तरह से देखने को मिलेगा, लेकिन जब बात आती है देश की राजधानी दिल्ली की तो यहां पर आजादी के निशान पूरी तरह से आज भी जिंदा हैं. खास तौर पर लाल किला वह जगह है, जहां से स्वतंत्रता दिवस से लेकर आज तक प्रधानमंत्री झंडा रोहण करते आए हैं और देश को संबोधित करते हैं. लाल किले के आसपास चाहे चांदनी चौक बाजार हो या फिर इसकी आसपास की सड़कें आज भी इतिहास और आजादी की लड़ाई की गवाही देती हैं. ऐसे में आइये चलिए आज आपको बताते हैं कि आखिर लाल किले के आसपास कौन सी हैं वो जगहें हैं और क्या है उनका नाम.
लाल किला और इसका इतिहास
1857 की क्रांति के बाद यहीं पर आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया, 1945-46 में इसी किले में आईएनए के अफसरों जैसे शाहनवाज़ खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर ऐतिहासिक मुकदमा चला. 15 अगस्त 1947 को पहली बार यहीं से तिरंगा फहराया गया और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया. आज भी आईएनए ट्रायल से जुड़ी बैरकें देखी जा सकती हैं.
सलीमगढ़ किला भी है खास
सलीमगढ़ किला लाल किले से जुड़ा हुआ किला है. अंग्रेजों ने इसे जेल के रूप में इस्तेमाल किया. कई स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक कैदियों को यहां रखा गया था. बहुत कम लोग जानते हैं कि यह लाल किले के परिसर का ही हिस्सा है. जहां से ट्रेन निकलती है, वहां पर यानी चांदनी चौक जाते समय फ्लाईओवर से पहले यह किला ऊंचाई पर होने के चलते थोड़ा कम नजर आता है. हालांकि इतिहासकार इसे बखूबी जानते हैं.
जानें कहां है खूनी दरवाजा
खूनी दरवाजा दिल्ली का बेहद मनहूस दरवाजा आज तक माना जाता है. इसके पीछे की कहानी पर नजर डालें तो
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज अधिकारी हडसन ने बहादुर शाह ज़फर के तीन शहजादों को यहीं गोली मार दी थी. यह घटना अंग्रेजी दमन का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है. आज तक खूनी दरवाजे के आसपास जाने से लोग डरते हैं.
चांदनी चौक बाजार
आप सोच रहे होंगे चांदनी चौक तो बाजार है. इसका इतिहास की लड़ाई या आजादी की लड़ाई से क्या लेना देना. ऐसे में आपको बता दें कि असहयोग आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां अनेक प्रदर्शन हुए थे. कई क्रांतिकारी गुप्त रूप से यहीं सक्रिय रहे. टाउन हॉल, चांदनी चौक ब्रिटिश शासन का प्रशासनिक केंद्र है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यहां कई विरोध प्रदर्शन हुए थे.
इसके अलावा काश्मीरी गेट जिसका संबंध 1857 के विद्रोह में सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक यहीं लड़ी गई. अंग्रेजों ने इसी रास्ते से दिल्ली पर दोबारा कब्जा किया था. 1857 के विद्रोह के दौरान चांदनी चौक और उसके आसपास का इलाका महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा. लाल किला और चांदनी चौक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. 1857 में बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में दिल्ली विद्रोह का प्रमुख केंद्र बनी थी. चांदनी चौक सिर्फ बाजार नहीं था, बल्कि पुरानी दिल्ली का राजनीतिक, सामाजिक और व्यापारिक केंद्र भी था.
