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क्या आप उस अनाथ खैरी बाघिन के बारे में जानते हैं जो इंसानों के बीच परिवार में रही और कुत्तों व पालतू जानवरों संग खेली. उस खैरी बाघिन ने कैसे भारत में बाघों को समझने का नजरिया बदल दिया था. 1974 में सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के पास मिली खैरी को वन अधिकारी सरोज राज चौधरी ने पाला था, आइए जानते हैं उसकी कहानी..
कौन थी खैरी बाघिन? कैसे उसने बाघों को समझने में मदद की.
जब भी बाघों की बात होती है तो खैरी बाघिन नाम सबसे पहले सामने आता है. जिसने भारत में बाघों को समझने का नजरिया ही बदल दिया. कभी इंसानों के बीच घर में रही और कुत्तों व पालतू जानवरों के संग खेलने वाली खैरी बाघिन की कहानी जितनी दिलचस्प है उतनी ही गहरी है. जिसने न केवल लाखों लोगों का दिल जीता बल्कि वैज्ञानिकों को भी बाघों के व्यवहार को समझने का नया नजरिया दिया. आइए जानते हैं कौन थी बाघिन ‘खैरी’.
खैरी की कहानी साल 1974 में शुरू हुई. जब ओडिशा के सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के पास खैरी नदी के किनारे एक अनाथ बाघ का बच्चा बहकर आ गया. बच्चा इतना छोटा था कि उसे किसी वन्य जीव अभ्यारण्य या जंगल में छोड़ना सुरक्षित नहीं था तो उस समय के वन अधिकारी सरोज राज चौधरी और उनकी पत्नी नीहार नलिनी चौधरी उसे अपने घर ले आए. दोनों उसका बच्चे की तरह ध्यान रखते और उसका नाम भी रख दिया खैरी. यह उनाम उसे उस नदी के नाम पर मिला जिसके किनारे वह मिली थी.
दिन गुजरने लगे, खैरी सरोज राज के परिवार में सदस्य की तरह पलने-बढ़ने लगी.वह घर में खुलेआम घूमती, कुत्तों और अन्य पालतू जानवरों के साथ खेलती और इंसानों के बीच रहते हुए प्रसन्न रहती. हालांकि इसके बावजूद भी वह अपना जंगली स्वभाव पूरी तरह नहीं भूली.
जब वह थोड़ी संभलने लायक हुई तो सरोज राज ने उस जंगल में छोड़ने का फैसला किया. वे उसे जंगल में छोड़कर आते और दुखी होते, लेकिन उनको दुखी हुए ज्यादा समय भी नहीं बीतता और खैरी लौटकर वापस आ जाती. ऐसा कई बार हुआ. खैरी हर बार लौटकर अपने इस परिवार के पास आ जाती.
आखिरकार सरोज राज ने उसे जंगल छोड़ने की कोशिश करनी बंद कर दी. वह घर में रहती रही, लेकिन इस दौरान जो सबसे बेहतर चीज हुई, वह यह थी कि खैरी का व्यवहार वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन गया. सरोज राज चौधरी उसके व्यवहार का गहराई से अध्ययन करते रहे. उन्होंने बाघों के सामाजिक व्यवहार, उनकी आदतों और इंसानों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश की और कई बड़ी जानकारियां हासिल की.
इंसानों के बीच पले-बढ़े होने के कारण खैरी पूरी तरह जंगल में स्वतंत्र जीवन नहीं जी सकी. बाद में उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और 1981 में उसकी मृत्यु हो गई. लेकिन उसके जीवन ने वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ दी. यही वजह है कि आज सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व भारत के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में गिना जाता है.
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Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …
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