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Arjuna Ranatunga on Vaibhav Sooryavanshi: श्रीलंका को 1996 वर्ल्ड कप जिताने वाले कप्तान अर्जुन रणतुंगा ने वैभव सूर्यवंशी को लेकर अहम सलाह दी है. रणतुंगा का मानना है कि वैभव अभी बच्चे हैं और उन्हें कमर्शियल चमक-दमक व गैर-जरूरी दबाव से दूर रखना चाहिए. उन्होंने साफ कहा कि टी20 सिर्फ मनोरंजन दे सकता है, असली पहचान टेस्ट क्रिकेट की तकनीक से बनेगी. रणतुंगा ने वैभव को सचिन, द्रविड़ और गावस्कर जैसे दिग्गजों के अनुभवों से सीखने की नसीहत दी है.
वैभव सूर्यवंशी टी20 के विस्फोटक बल्लेबाज हैं.
नई दिल्ली. क्रिकेट जगत में जब भी किसी बाल-प्रतिभा का उदय होता है, तो उम्मीदों और आशंकाओं का दौर एक साथ शुरू हो जाता है. भारत के 15 वर्षीय युवा सनसनी वैभव सूर्यवंशी जब सुर्खियों में आए, तो श्रीलंका को 1996 में वर्ल्ड चैंपियन बनाने वाले कप्तान अर्जुन रणतुंगा की नजरें भी उन पर टिकीं. खुद किशोरावस्था में इंटरनेशनल स्टेज पर कदम रखने वाले रणतुंगा ने वैभव को लेकर एक बेहद गंभीर और सोच विचार करने वाला मैसेज दिया है. उनका साफ मानना है कि महज 15 साल के इस लड़के को किसी भी तरह के दबाव में झोंकने के बजाय खुलकर अपने स्वाभाविक खेल का आनंद लेने देना चाहिए.
फर्स्ट पोस्ट को दिए इंटरव्यू में अर्जुन रणतुंगा (Arjun Ranatunga) ने बेहद बेबाकी से कहा कि वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Sooryavanshi) को लेकर जल्दबाजी में कोई बड़ी राय कायम करना ठीक नहीं है. वह अभी एक बच्चा है और उसे अपना बचपन जीने की आजादी मिलनी चाहिए. मॉडर्न क्रिकेट में युवा खिलाड़ियों के इर्द-गिर्द जिस तरह मैनेजरों, एजेंटों और स्पॉन्सरशिप का जाल बिछ जाता है, वह किसी भी उभरते करियर के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है. रणतुंगा का मानना है कि यदि कोई खिलाड़ी इतनी कम उम्र में कमर्शियल चमक-दमक के मायाजाल में फंस गया, तो उसकी एकाग्रता और खेल दोनों बिखर सकते हैं. इसलिए फिलहाल सबसे जरूरी यह है कि उसे बाहरी शोर और बाजार के दबाव से दूर रखा जाए.
वैभव सूर्यवंशी टी20 के विस्फोटक बल्लेबाज हैं.
मनोरंजन बनाम गंभीर क्रिकेट
रणतुंगा ने क्रिकेट के फॉर्मेट और तकनीक के संदर्भ में एक स्पष्ट लकीर खींची. उनका कहना है कि टी20 क्रिकेट में कोई भी खिलाड़ी एक बेहतरीन ‘एंटरटेनर’ बन सकता है, लेकिन किसी बल्लेबाज की असली परीक्षा खेल के लंबे प्रारूप यानी टेस्ट क्रिकेट में ही होती है. यदि वैभव को इंटरनेशनल क्रिकेट में लंबे समय तक टिकना है और एक संपूर्ण क्रिकेटर बनना है, तो उन्हें अपनी बुनियादी तकनीक पर लगातार कड़ी मेहनत करनी होगी. फैसला पूरी तरह वैभव के हाथ में है कि वह सिर्फ छोटे फॉर्मेट का रोमांचक खिलाड़ी बनकर संतुष्ट होना चाहते हैं या फिर टेस्ट क्रिकेट की कसौटी पर खरा उतरकर खुद को एक महान बल्लेबाज के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.
भारतीय दिग्गजों से सीखने की नसीहत
भारत में मौजूद क्रिकेट के समृद्ध ज्ञान की चर्चा करते हुए रणतुंगा ने कहा कि वैभव के पास दुनिया के सबसे बेहतरीन मार्गदर्शकों की मौजूदगी का फायदा है. उन्होंने सुनील गावस्कर, मोहम्मद अजहरुद्दीन, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गजों का जिक्र किया. रणतुंगा ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके दौर में श्रीलंकाई क्रिकेटर गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे भारतीय दिग्गजों को देखकर खेल की बारीकियां सीखते थे. ठीक उसी तरह, वैभव को भी इन भारतीय महारथियों से यह समझना चाहिए कि मुश्किल समय और विपरीत परिस्थितियों का सामना कैसे किया जाता है.
रणतुंगा का खुद का सफर और सोबर्स की सीख
अर्जुन रणतुंगा का यह नजरिया उनके खुद के जीवन के अनुभवों से उपजा है. उन्हें खुद महान ऑलराउंडर सर गैरी सोबर्स ने स्कूल के दिनों में पहचाना था. सोबर्स ने 1982 के ऐतिहासिक पहले टेस्ट से लेकर 1983 विश्व कप तक श्रीलंका को तराशा था. रणतुंगा ने न केवल अपनी टीम को 1996 का विश्व कप जिताया, बल्कि खिलाड़ियों के हक और सम्मान के लिए हमेशा क्रिकेट बोर्ड और सत्ता से टकराने का हौसला भी दिखाया. आज 62 वर्ष की उम्र में भी, भले ही वह किसी आधिकारिक पद पर न हों, खेल की नब्ज पर उनकी पकड़ उतनी ही मजबूत है. रणतुंगा की यह सलाह सिर्फ वैभव सूर्यवंशी के लिए नहीं, बल्कि आज के दौर में उभर रहे हर उस युवा क्रिकेटर के लिए एक सबक है, जो चकाचौंध के बीच अपनी जड़ों को भूलने के मुहाने पर खड़ा है. क्रिकेट के लंबे सफर में टिके रहने के लिए मजबूत तकनीक, सही मार्गदर्शन और धैर्य से बड़ा कोई हथियार नहीं होता.
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कमलेश कुमार राय नेटवर्क18 ग्रुप में बतौर चीफ सब एडिटर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वह बीते 15 सालों से खेल पत्रकारिता की पिच पर डटे हुए हैं. हिंदी स्पोर्ट्स सेक्शन में वह खेल कंटेंट की गहरी समझ, सटीक विश्लेषण और ब…
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