दिल्ली. शिक्षक सिर्फ वह नहीं होता जो किताबों का ज्ञान दे, बल्कि असली शिक्षक वह है जो जिंदगी की मुश्किल राह में किसी का हाथ थामे और उसे आगे बढ़ने का हौसला दे. ऐसी ही एक मिसाल हैं पूजा उदयन. बचपन में माता-पिता को खोने के बाद महज 5 साल की उम्र में एक संस्थान में पहुंचीं पूजा ने वहीं से जिंदगी को एक नई दिशा दी. आज वह उन बच्चों और युवाओं के लिए काम कर रही हैं, जिन्हें 18 साल की उम्र के बाद अक्सर अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है.
पूजा Care Leavers Advocacy Network (CLAN) की संस्थापक हैं. यह संस्था उन युवाओं के साथ काम करती है, जो बचपन में चाइल्ड केयर संस्थानों या अनाथालयों में रहे हैं और 18 साल की उम्र के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई, नौकरी और जिंदगी शुरू करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
खुद का दर्द बना दूसरों की मदद की वजह
पूजा बताती हैं कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था. परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी और वह स्लम इलाके में रहती थीं. इसके बाद उन्हें Udayan Care जैसे संगठन का सहारा मिला, जहां उन्हें सिर्फ रहने की जगह ही नहीं मिली, बल्कि ऐसे मेंटर्स मिले जिन्होंने उन्हें परिवार की तरह संभाला. यहीं से पूजा को यह समझ आया कि हर बच्चे को सही समय पर सही मार्गदर्शन मिल जाए तो उसकी जिंदगी बदली जा सकती है. उनके अपने अनुभव ने ही उन्हें दूसरे बच्चों के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी.
पढ़ाई से लेकर लंदन तक का सफर
पूजा ने अपनी स्कूली पढ़ाई DPS ग्रेटर नोएडा से की. इसके बाद उन्होंने सोशल वर्क में स्नातक किया और Genpact के CSR विभाग में काम शुरू किया. यहां उन्हें अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं और बच्चों के साथ काम करने का मौका मिला. वर्ष 2020 में पूजा ने एक बड़ा कदम उठाया. उन्होंने यूनाइटेड किंगडम की प्रतिष्ठित चेवनिंग स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई किया, जिसमें 169 देशों से 69,000 लोग शामिल हुए थे.
इस कठिन प्रतियोगिता में केवल 16 लोग चुने गए और पूजा उनमें से एक थीं. इस स्कॉलरशिप की मदद से पूजा ने 2021 में लंदन के एसओएएस, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से एमएससी डेवलपमेंट स्टडीज में पढ़ाई की. भारत लौटने के बाद EY और Tata Chroma जैसी बड़ी कंपनियों में भी काम किया, लेकिन समाज के लिए काम करने का सपना हमेशा उनके मन में रहा.
15 साल की उम्र से शुरू होती है मदद
पूजा की संस्था बच्चों के 18 साल के होने का इंतजार नहीं करती. वह करीब 15 साल की उम्र से ही बच्चों के साथ जुड़ना शुरू कर देती है. सबसे पहले उनसे दोस्ती की जाती है और उन्हें जीवन से जुड़ी जरूरी बातें और लाइफ स्किल्स सिखाई जाती हैं. 17 साल की उम्र में बच्चों की जरूरतों को समझने के लिए उनका नीड असेसमेंट किया जाता है.
इसके बाद उनकी पढ़ाई, स्किल और रोजगार को ध्यान में रखते हुए सही कोर्स चुनने में मदद की जाती है. कोशिश रहती है कि उन्हें ऐसा कोर्स मिले, जहां रहने की सुविधा भी हो और कोर्स पूरा करने के बाद वह अपनी पहली नौकरी शुरू कर सकें.
हर बच्चे की जरूरत अलग, इसलिए मदद भी अलग
पूजा कहती हैं कि हर बच्चा और हर युवा अलग होता है. किसी की जरूरत पढ़ाई है तो किसी को स्किल सीखने की जरूरत होती है, जबकि किसी को भावनात्मक सहारे की जरूरत पड़ सकती है. इसलिए संस्था हर युवा की जरूरत के हिसाब से उसके लिए मदद का रास्ता तैयार करती है. इससे जिसको जिस चीज की जरूरत होती है वह पूरी होती है.
