11 साल से पार्क में लगा रही हैं बच्चों की क्लास, 100 से ज्यादा बच्चे बना चुके हैं करियर, जानें कौन हैं दिल्ली की नमिता चौधरी

दिल्ली: कुछ सपने हालात से बड़े होते हैं, बस उन्हें सही दिशा दिखाने वाले किसी एक शख्स की जरूरत होती है. दिल्ली के द्वारका के एक पार्क में रोज ऐसे ही कई सपनों को उड़ान देने का काम कर रही हैं नमिता. यहां पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे प्रवासी मजदूरों के परिवारों या झुग्गी-बस्तियों से आते हैं. उनके परिवारों के लिए रोजी-रोटी सबसे बड़ी जरूरत है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई अक्सर पीछे छूट जाती है, लेकिन नमिता पिछले 11 साल से इन बच्चों को पढ़ाकर उनके भविष्य को संवारने में जुटी हैं.

घर संभालते-संभालते मन में आया सवाल

नमिता चौधरी मूल रूप से बिहार की रहने वाली हैं. उनकी शादी काफी कम उम्र में हो गई थी. 20 साल की उम्र में शादी और 22 साल की उम्र में मां बनने के बाद उनकी जिंदगी घर और बच्चों की जिम्मेदारियों में ही बीतने लगी. करीब 6 साल बाद उनका दूसरा बच्चा हुआ, लेकिन एक समय ऐसा आया, जब उनके मन में सवाल उठा कि आखिर जिंदगी का मकसद सिर्फ घर संभालना ही है या इसके आगे भी कुछ किया जा सकता है. इसी दौरान मुंबई में रहते हुए उनकी कुछ दोस्तों से मुलाकात हुई, जो अनाथालय में बच्चों को पढ़ाने जाती थीं. नमिता भी उनके साथ बच्चों को पढ़ाने पहुंचीं. वहां बच्चों की जिंदगी और उनकी परेशानियों को करीब से देखकर उनके मन में कुछ करने की इच्छा और मजबूत हो गई.

दिल्ली आईं तो बच्चों की कमी खलने लगी

मुंबई से दिल्ली आने के बाद नमिता के लिए सब कुछ नया था. नया शहर, नए लोग और नया माहौल. इस दौरान उन्हें उन बच्चों की काफी याद आती थी, जिन्हें वह पढ़ाती थीं. द्वारका के बालाजी पार्क में उनकी नजर कुछ बच्चों पर पड़ी. उन्होंने वहीं से बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. शुरुआत में कुछ ही बच्चे आए, लेकिन धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और देखते ही देखते यह सफर 11 साल का हो गया. आज इसी पहल को छोटी सी खुशी के नाम से जाना जाता है.

शुरुआत हुई मुश्किल से

शुरुआत में जब पांच बच्चे पढ़ने आए तो धीरे-धीरे आसपास के दूसरे बच्चे भी जुड़ने लगे. सामने ही मजदूरों और गरीब परिवारों की बस्ती थी. छोटे-छोटे घरों में रहने वाले इन परिवारों के लिए बच्चों को पढ़ाने भेजना भी एक बड़ी बात थी. नमिता और उनकी टीम बच्चों को बिल्कुल मुफ्त पढ़ाती थी, लेकिन एक दिन अचानक पार्क में एक भी बच्चा नहीं आया, न कोई परिवार. बाद में पता चला कि बस्ती में किसी ने अफवाह फैला दी थी कि ये महिलाएं बच्चों को यहां बुलाकर उन्हें बेच देती हैं या काम करवाने वाली एजेंसियों को सौंप देती हैं. डर की वजह से उनके माता-पिता ने बच्चों को भेजना बंद कर दिया. इसके बाद नमिता और उनकी टीम खुद बस्ती में पहुंचीं. उन्होंने लोगों को समझाया और करीब डेढ़ महीने तक वहीं बच्चों को पढ़ाया. रास्ते में गंदा पानी, कीचड़ और मच्छरों के बीच भी उन्होंने पढ़ाना जारी रखा. धीरे-धीरे परिवारों का भरोसा वापस आया और बच्चे फिर से पढ़ाई से जुड़ने लगे.

आज 60-70 बच्चे रोज आते हैं पढ़ने

आज सेक्टर-3 में करीब 60 से 70 बच्चे अलग-अलग शिफ्ट में पढ़ने आते हैं. सुबह लड़कों की क्लास होती है और दोपहर में लड़कियां पढ़ने आती हैं. यहां बच्चों को सिर्फ उनकी स्कूल की कक्षा के हिसाब से नहीं पढ़ाया जाता. पहले उनका एक सामान्य टेस्ट लिया जाता है, जिससे यह समझने की कोशिश होती है कि बच्चे को कितना आता है और उसकी पढ़ाई किस स्तर पर है.इसके बाद जरूरत के हिसाब से बच्चों को रिमेडियल क्लास दी जाती है और जब उनका बेस मजबूत हो जाता है, तो उन्हें उनकी सही कक्षा के स्तर पर लाया जाता है.

100 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई पूरी कर बना रहे अपना करियर

नमिता की मेहनत का असर आज साफ दिखाई देता है. पिछले 11 सालों में 100 से ज्यादा बच्चे यहां से पढ़कर आगे बढ़ चुके हैं. कोई अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम कर रहा है तो कोई म्यूजिक इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना रहा है. एक छात्र सुहैल गीत लिखते हैं. कुछ बच्चे टूर एंड ट्रैवल कंपनियों में काम कर रहे हैं तो कुछ आगे की पढ़ाई और UPSC की तैयारी कर रहे हैं. एक छात्र को स्कॉलरशिप के जरिए दिल्ली कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला और आज वह मुंबई में काम कर रहा है. जल्द ही वह काम के सिलसिले में विदेश भी जाने वाला है.

परिवार की जिम्मेदारी के साथ बच्चों का भविष्य भी संभाला

नमिता के लिए यह सफर आसान नहीं था. जब उन्होंने यह काम शुरू किया, तब उनके अपने बच्चे भी छोटे थे. उनके पति और ससुराल वालों को चिंता थी कि कहीं बच्चों और घर की जिम्मेदारियां पीछे न छूट जाएं.नमिता ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह घर और इन बच्चों, दोनों की जिम्मेदारी को साथ लेकर चलेंगी. परिवार ने भी धीरे-धीरे उनकी बात समझी और उनका साथ देना शुरू किया. आज उनके साथ करीब 15 से 20 लोगों की टीम जुड़ी हुई है. आसपास की सोसायटियों से भी लोग बच्चों को पढ़ाने के लिए आते हैं.

खुले आसमान के नीचे लगती है ये अनोखी पाठशाला

नमिता इन कक्षाओं को किसी बंद कमरे में नहीं करना चाहतीं. उनका मानना है कि खुले आसमान के नीचे पढ़ने का अपना अलग मजा है. बच्चे पढ़ाई के साथ खेलते भी हैं, अलग-अलग गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और इसके बावजूद उनका ध्यान पढ़ाई से नहीं भटकता, लेकिन बारिश और बहुत ज्यादा गर्मी के दिनों में परेशानी होती है और क्लास बंद करनी पड़ती है, लेकिन नमिता के लिए यह भी इस खुले स्कूल का हिस्सा है.

जो बच्चे कभी यहां पढ़े,आज वही दूसरों को पढ़ा रहे

इस पाठशाला की सबसे खूबसूरत बात यह है कि जो बच्चे कभी नमिता से पढ़ने आते थे, उनमें से कई आज खुद दूसरों को पढ़ाने के लिए वापस आते हैं. नमिता चाहती हैं कि जब ये बच्चे बड़े हों और अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, तो अपनी बस्ती के दूसरे बच्चों के लिए भी कुछ करें. अगर वे रोज समय नहीं दे सकते तो कम से कम हफ्ते में एक दिन अपने समुदाय के बच्चों को पढ़ाने के लिए जरूर निकालें.

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