OPINION: क्रिमिनल्स तो संभल नहीं रहे, और दिल्ली पुलिस चल दी‍ पीजी में रहने वाले स्टूडेंट्स के मसले सुलझाने

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OPINION: अपराधी संभल नहीं रहे, और दिल्ली पुलिस चली स्टूडेंट्स के मसले सुलझाने

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दिल्ली पुलिस में 9,248 पोस्ट्स खाली पड़ी हैं और 2.1 करोड़ की आबादी का क्राइम इनसे संभल नहीं रहा. गैंगवार और स्नेचिंग के बीच अब SHOs को PG में रहने वाले स्टूडेंट्स के किराए और मेंटेनेंस वाले क्लेश सुलझाने का नया काम थमा दिया गया है. लंदन-न्यूयॉर्क पुलिस सिर्फ क्राइम पर फोकस करती है और PG का झंझट सिविल एडमिनिस्ट्रेशन संभालता है. जब मेनपॉवर ही कम है तो इस ओवरलोड से सिस्टम क्रैश होना तय है.

दिल्‍ली पुलिस पर नई जिम्‍मेदारी थोपी गई है. (File Photo)

दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर ने एक नया ऑर्डर पास किया है. अब SHO और ACP को दिल्ली के कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज और PG/रेंटेड कमरों में रहने वाले स्टूडेंट्स से डायरेक्ट कनेक्ट करना होगा. मकसद है स्टूडेंट्स की सेफ्टी और उनकी प्रॉब्लम सॉल्व करना, जिसकी एक्‍शन टेकन रिपोर्ट (ATR) 20 सितंबर 2026 तक सबमिट करनी है. सुनने में तो यह स्टूडेंट फ्रेंडली और काफी कूल वाइब देता है लेकिन रियल ग्राउंड पर यह फैसला पुलिस के मेन काम और पहले से झोल खा रहे सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े करता है. ग्लोबल लेवल पर पुलिसिंग का एक ही सिंपल रूल है. क्राइम प्रिवेंशन, कंट्रोल और इन्वेस्टिगेशन. लंदन पुलिस हो या न्यूयॉर्क की NYPD, दुनिया की बड़ी कैपिटल्स में पुलिस का मेन फोकस हैवी क्राइम, ट्रैफिक और साइबर फ्रॉड से निपटने पर होता है. PG के घटिया खाने, मकान मालिक-किराएदार के मेंटेनेंस के झंझट या बिजली-पानी का सीन क्लियर करना सिविल एडमिनिस्ट्रेशन (MCD) और RWA का काम है. जब पुलिस को इन नॉन-पुलिसिंग कामों में उलझाया जाएगा तो उनकी असली ड्यूटी यानी गश्त और इन्वेस्टिगेशन का तो कचरा होना तय है.

क्राइम तो संभल नहीं रहा, ऊपर से ये नई जिम्मेदारी

दिल्ली में आए दिन गैंगवार, स्नेचिंग, साइबर फ्रॉड और महिलाओं के खिलाफ क्राइम के बड़े-बड़े कांड हो रहे हैं. सीरियस केसेज की तफ्तीश महीनों लटकी रहती है. जब पुलिस से अपना प्राइमरी काम यानी क्राइम कंट्रोल ही ठीक से हैंडल नहीं हो पा रहा, तब अफसरों को PG और रेंट का क्लेश सुलझाने में लगाना प्रायोरिटीज का गलत सिलेक्शन लगता है.
दिल्ली पुलिस पर ऑलरेडी भारी वर्कलोड का प्रेशर
1. VIP मूवमेंट और सिक्योरिटी: लुटियंस दिल्ली में लगातार विदेशी डेलिगेट्स और VVIPs का तांता.
2. प्रोटेस्ट और लॉ एंड ऑर्डर: जंतर-मंतर से लेकर बॉर्डर्स तक आए दिन होने वाले प्रोटेस्ट्स.
3. ट्रैफिक जाम का झंझट: लाखों गाड़ियों का डेली मैनेजमेंट.
सिपाही से लेकर SHO लेवल के ऑफिसर्स 14-16 घंटे की नॉन-स्टॉप ड्यूटी कर रहे हैं. इस ओवरबर्डन स्टाफ से अब यह उम्मीद करना कि वो हर PG में जाकर स्टूडेंट्स की प्रॉब्लम्स सुनें और MCD के चक्कर काटें, थोड़ा प्रैक्टिकल नहीं लगता.

शहर / पुलिस बल कुल जनसंख्या (लगभग) स्वीकृत पद vs वर्तमान पुलिस बल खाली पद (Vacancies) पुलिस-नागरिक अनुपात (प्रति 1 लाख आबादी) मुख्य कार्य और प्राथमिक जिम्मेदारी (Core Focus)
दिल्ली पुलिस (Delhi Police) ~2.1 से 2.2 करोड़ • स्वीकृत पद: 94,044• कार्यरत बल: ~84,796 9,248 पद खाली (लगभग 10% कमी, अधिकांश फील्ड स्टाफ) ~385-390 (स्वीकृत बल पर ~425) • क्राइम प्रिवेंशन व इन्वेस्टिगेशन• VVIP सुरक्षा (लुटियंस दिल्ली)• धरने-प्रदर्शन व लॉ एंड ऑर्डर संभालना• ट्रैफिक मैनेजमेंट व सिविल समन्वय
न्यूयॉर्क पुलिस (NYPD – USA) ~83 – 85 लाख • स्वीकृत पद: ~35,000 (वर्दीधारी)• कार्यरत बल: ~33,800 ~1,200 (सिविलियन स्टाफ अलग से 15,000 है) ~405 – 410 • केवल स्ट्रीट क्राइम प्रिवेंशन व कंट्रोल• एंटी-टेररिज्म और काउंटर-इंटेलिजेंस• गंभीर अपराधों की त्वरित जांच (Investigation)• (VIP सुरक्षा व सिविल काम अलग एजेंसियों के पास)
लंदन पुलिस (Met Police – UK) ~90 – 95 लाख • स्वीकृत पद: ~35,500• कार्यरत बल: ~34,000 ~1,500 (सपोर्ट स्टाफ अलग से 10,000 है) ~360 – 370 • कम्युनिटी पुलिसिंग व स्ट्रीट क्राइम कंट्रोल• फॉरेंसिक व क्राइम इन्वेस्टिगेशन• एंटी-टेरर ऑपरेशन्स (Counter-Terrorism)• (नगर निगम व लोकल काउंसिल सिविल झंझट संभालती हैं)

दिल्‍ली पुलिस से जुड़े 3 कड़वे सच
1. 10% पद खाली, फिर भी काम का बोझ सबसे ज्यादा: दिल्ली पुलिस में करीब 9,248 पद खाली हैं, जिनमें से ज्यादातर कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल और सब-इंस्पेक्टर के हैं. यानी फील्ड में तफ्तीश और गश्त करने वाले जवानों की ही सबसे भारी कमी है.
2. आबादी का भारी अंतर: लंदन और न्यूयॉर्क की आबादी दिल्ली की तुलना में आधी से भी कम (85-90 लाख) है, फिर भी वहां की पुलिस सिर्फ क्राइम कंट्रोल पर फोकस करती है. दिल्ली में 2.1 करोड़ की आबादी पर पहले से 9 हजार पुलिसकर्मी कम हैं.
3. गैर-पुलिसिंग का अतिरिक्त प्रेशर: जब फील्ड में स्टाफ की इतनी किल्लत है, तब पुलिस से क्राइम रोकने के बजाय PG के विवाद सुलझाने, किराएदारों और MCD के साथ कोऑर्डिनेट करने जैसे सिविल काम करवाना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी को पूरी तरह पटरी से उतार देता है.

बॉटम लाइन क्या है?
स्टूडेंट्स की सेफ्टी सुपर इम्पॉर्टेंट है लेकिन इसके लिए पुलिस को सिविल मैनेजर बनाने के बजाय सिविल एडमिनिस्ट्रेशन को एक्टिव करना चाहिए. PG विवादों के लिए यूनिवर्सिटी और सिविल अथॉरिटी का अलग सेल होना चाहिए. पुलिस की एंट्री सिर्फ तब होनी चाहिए जब मैटर सच में लॉ एंड ऑर्डर या किसी क्राइम का हो. जब तक पुलिस को गैर-जरूरी प्रशासनिक कामों से फ्री करके सिर्फ क्राइम कंट्रोल पर फोकस नहीं कराया जाएगा, तब तक ना तो दिल्ली में क्राइम थमेगा और ना ही पब्लिक का सिस्टम पर भरोसा बनेगा.

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Sandeep GuptaChief Sub Editor

पत्रकारिता में 16 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर होम पेज पर जिम्‍मेदारी संभाल रहे हैं. जटिल और सामरिक विषयों को बेहद सरल भाषा में पाठकों त…

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