नई दिल्ली. रिंग में गूंजता म्यूज़िक, हजारों दर्शकों का शोर, दो पहलवानों की तीखी बहस और फिर शुरू होती है ज़ोरदार मारधाड़. वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट दशकों से दुनिया भर के करोड़ों लोगों के दिलों पर राज कर रहा है. भारत में तो इसकी दीवानगी किसी त्योहार से कम नहीं है. लेकिन इस चमक-धमक और एक्शन के बीच हर फैन के मन में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या यह फाइट सच में होती है? क्या रिंग में दिखने वाला खून और दर्द असली है, या यह सब केवल एक बुना हुआ नाटक है?
इस रंगीन और हैरतअंगेज़ दुनिया का सीधा और साफ सच यह है कि डब्ल्यूडब्ल्यूई ( WWE) की हर फाइट, हर कहानी और हर मैच का नतीजा लगभग 99 प्रतिशत पहले से तय होता है. इसे आप एक बड़े बजट की एक्शन फिल्म की तरह समझ सकते हैं. जिस तरह फिल्म में डायरेक्टर और स्टंटमैन मिलकर एक कहानी गढ़ते हैं, ठीक वैसे ही डब्ल्यूडब्ल्यूई में ‘क्रिएटिव राइटर्स’ की एक पूरी टीम होती है. यह टीम तय करती है कि कौन सा रेसलर विलेन बनेगा और कौन हीरो, मैच के दौरान कौन सा ड्रामा चलेगा और सबसे अहम बात कि अंत में जीत किसकी होगी. साल 1990 के दौर में टैक्स से जुड़े नियमों के कारण डब्ल्यूडब्ल्यूई के मालिक विंस मैकमोहन ने खुद कोर्ट में यह स्वीकार किया था कि उनका यह बिजनेस कोई असली प्रतिस्पर्धी खेल नहीं, बल्कि केवल ‘स्पोर्ट्स एंटरटेनमेंट’ यानी मनोरंजन का एक जरिया है.
रिंग का असली दर्द और चोट का जोखिम
भले ही कहानी पहले से लिखी गई हो, लेकिन रिंग में लिया जाने वाला रिस्क शत-प्रतिशत असली होता है. रेसलर्स जब 10-12 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाते हैं या लकड़ी की टेबल पर गिरते हैं, तो शरीर पर पड़ने वाला असर और दर्द नकली नहीं हो सकता. कई बार अभ्यास की कमी या टाइमिंग की गलती की वजह से पहलवान गंभीर रूप से चोटिल हो जाते हैं. जॉन सीना (John Cena) , ट्रिपल एच (Triple H) और द अंडरटेकर (The Undertaker) जैसे दिग्गजों की हड्डियां टूटी हैं, गर्दन में फ्रैक्चर हुए हैं और उन्हें महीनों तक अस्पताल में गुजारना पड़ा है.
खून बहने का सच और सुरक्षा की तकनीकें
रिंग में जब किसी रेसलर का चेहरा खून से लथपथ दिखता है, तो उसके पीछे खास तकनीकें काम करती हैं. हल्के कट या केवल ड्रामा दिखाने के लिए रेसलर अपने मुंह में ब्लड कैप्सूल छिपाकर रखते हैं और सही समय पर उसे चबाकर मुंह से खून बहने का अहसास कराते हैं. इसके अलावा, रेसलर्स को एक-दूसरे की सुरक्षा का खास ध्यान रखने की ट्रेनिंग दी जाती है. वे सीधे मुंह पर पंच नहीं मारते, बल्कि मुक्के का एंगल थोड़ा घुमावदार रखते हैं जिससे चोट न लगे. जिस रिंग में वे लड़ते हैं, उसके रबड़ वाले मैट के नीचे खास किस्म के टाइट स्प्रिंग्स लगाए जाते हैं, जो नीचे गिरने पर झटके को सोख लेते हैं. इसी तकनीक की वजह से अंडरटेकर के खतरनाक ‘चॉकस्लैम’ के बाद भी विरोधी रेसलर दोबारा उठ खड़ा होता है.
खतरनाक हथियार और खास ट्रेनिंग
रिंग में इस्तेमाल होने वाले हथियार जैसे कुर्सियां, हथौड़े और टेबल्स देखने में बेहद खतरनाक लगते हैं, लेकिन उन्हें खास तौर पर कस्टमाइज किया जाता है. रिंग साइड पर रखी कुर्सियां एल्युमिनियम की बनी और अंदर से खोखली होती हैं, जो मारने पर आवाज तो बहुत तेज करती हैं लेकिन गहरा घाव नहीं देतीं. ट्रिपल एच का प्रसिद्ध हथौड़ा भी आगे से रबर या फाइबर का बना होता है और मारते समय रेसलर हथौड़े के लोहे वाले हिस्से पर अपना हाथ रख लेता है ताकि सीधा प्रभाव न पड़े. रेसलिंग स्कूलों में सालों-साल सिर्फ मारना नहीं, बल्कि बिना चोट खाए ‘मार कैसे खानी है’ इसकी कठोर ट्रेनिंग दी जाती है.
कमाई का गणित और स्टार पावर
जहां तक कमाई की बात है, आम खेलों की तरह डब्ल्यूडब्ल्यूई में विजेता को ज्यादा पैसे मिलने का नियम नहीं है. यहां कमाई मैच जीतने से नहीं, बल्कि स्टार पावर और फैंस के बीच लोकप्रियता से तय होती है. यदि कोई बड़ा स्टार जैसे ब्रॉक लेसनर या द रॉक, स्क्रिप्ट के अनुसार मैच हार भी जाता है, तब भी उसे जीतने वाले नए रेसलर की तुलना में कहीं ज्यादा फीस मिलती है.
मनोरंजन का अनोखा संगम
डब्ल्यूडब्ल्यूई न तो पूरी तरह से असली है और न ही पूरी तरह से फर्जी. यह एथलेटिक्स, ड्रामा, स्टंटवर्क और बेहतरीन अभिनय का एक अनोखा संगम है. रिंग में उतरने वाले खिलाड़ी अपनी जान जोखिम में डालकर महीनों तक ट्रेनिंग करते हैं ताकि दर्शकों का मनोरंजन कर सकें. इसलिए अगली बार जब आप डब्ल्यूडब्ल्यूई देखें, तो इसे एक वास्तविक खेल के बजाय दुनिया के सबसे बड़े और साहसिक लाइव एक्शन शो के रूप में देखें.
