नई दिल्ली (Jamia MDS Course). देश के टॉप संस्थानों में शामिल जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई शर्त को लेकर चर्चा में है. यूनिवर्सिटी ने अपने इतिहास में पहली बार मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी (MDS) कोर्स शुरू किया है. लेकिन इस कोर्स में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स के सामने अनोखी चुनौती खड़ी हो गई है. नीट एमडीएस पास करके काउंसलिंग के जरिए सीट पाने वाले इन नए डॉक्टर को एडमिशन के समय शपथ पत्र या अंडरटेकिंग साइन करनी पड़ रही है.
इस अंडरटेकिंग में लिखवाया जा रहा है कि वे भविष्य में यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर या बाहर किसी भी तरह की हड़ताल या विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बनेंगे. मेडिकल और शैक्षणिक गलियारों में बहस छिड़ गई है कि क्या भविष्य के इन डॉक्टरों की आवाज दबाने की तैयारी चल रही है. यूनिवर्सिटी प्रशासन का तर्क है कि डेंटल सर्जरी बेहद रिसर्च और प्रैक्टिकल वाला कोर्स है. इसमें अटेंडेंस सबसे बड़ा पैमाना है. विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों के चक्कर में पढ़ाई का नुकसान न हो, इसलिए यह नियम बनाया गया है.
जामिया मिल्लिया में क्यों मचा बवाल?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने इस साल से अपने यहां एमडीएस (MDS) का पहला बैच शुरू किया है. जब स्टूडेंट्स एडमिशन की फॉर्मेलिटीज पूरी करने पहुंचे तो सामने रखा कागजातों का पुलिंदा देखकर वे चौंक गए. इस नए नियम के तहत छात्रों को बॉन्ड और अंडरटेकिंग साइन करना पड़ रहा है. इसमें साफ लिखा है कि वे किसी भी ऐसी एक्टिविटी या हड़ताल में शामिल नहीं होंगे, जिसे जामिया यूनिवर्सिटी के अनुशासन, शांति और कामकाज के खिलाफ माना जाए.
यूनिवर्सिटी ने दिया तर्क
यूनिवर्सिटी के इस कदम से असमंजस की स्थिति बन गई है. जामिया की मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) सायमा सईद ने साफ किया है कि इस अंडरटेकिंग का असर एडमिशन पर नहीं पड़ेगा. ये सीटें मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) की नीट-एमडीएस की मेरिट के आधार पर आवंटित की जाती हैं. अगर कोई स्टूडेंट इस पर तुरंत साइन नहीं करता है तो भी उसकी सीट रद्द नहीं होगी. यूनिवर्सिटी का दावा है कि यह कैंपस में स्वस्थ और अनुशासित माहौल बनाए रखने के लिए एक सामान्य कागजी प्रक्रिया है.
कोर्स छोड़ा तो चुकाने होंगे 10 लाख रुपये
हड़ताल न करने वाले पर्सनल बॉन्ड के अलावा इस एडमिशन प्रक्रिया का एक और हिस्सा छात्रों के लिए सिरदर्द बना हुआ है… और वह है 10 लाख रुपये का ‘डिस्कॉन्टिन्यूएशन बॉन्ड’. नियमों के मुताबिक, अगर कोई छात्र बीच में ही किसी भी वजह से यह कोर्स छोड़ता है तो उसे और उसके गारंटर को 10 लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा. इस रकम पर 15% की सालाना ब्याज दर से वसूली तब तक की जाएगी जब तक पूरा भुगतान न हो जाए.
छात्रों को हो जिम्मेदारी का अहसास
इस पर यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि डेंटल सर्जरी जैसी सुपर-स्पेशलिटी सीटों पर भारी सार्वजनिक निवेश (Public Investment) होता है. सरकार और संस्थान लैब, महंगे मेडिकल डिवाइस, फैकल्टी और क्लीनिकल रिसोर्सेज पर बड़ा खर्च करते हैं. अगर कोई बीच में सीट छोड़कर चला जाता है तो वह सीट खाली रह जाती है और देश का एक संभावित स्पेशलिस्ट डॉक्टर तैयार होने से चूक जाता है. इसलिए यह बॉन्ड इस बात की गारंटी के लिए है कि छात्र अपनी सीट की जिम्मेदारी को समझें और बीच में कोर्स न छोड़ें.
दूसरे बड़े संस्थानों में भी लागू हैं ऐसे सख्त नियम
नो स्ट्राइक बॉन्ड का क्या मतलब है?
जहां तक ‘नो-स्ट्राइक’ या हड़ताल विरोधी खंड की बात है तो जानकारों का मानना है कि मेडिकल प्रोफेशन इंसानी जिंदगी से जुड़ा है. रेजिडेंट डॉक्टर की हड़ताल से हॉस्पिटल की इमरजेंसी सेवाएं चरमरा जाती हैं. इसलिए संस्थान अपने स्तर पर एहतियात बरत रहे हैं. नेशनल डेंटल कमीशन (NDC) के नियमों में इस तरह के नो-स्ट्राइक बॉन्ड की अनिवार्यता नहीं है. लेकिन यूनिवर्सिटी ने अपने नए ऑर्डिनेंस (जो इस साल जून में एक्जीक्यूटिव काउंसिल से पास हुआ है) के तहत इसे शामिल किया है.
देखना होगा कि इस नए मेडिकल बैच के स्टूडेंट्स इन शर्तों के साथ अपने सफर की शुरुआत कैसे करते हैं.
