नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम बदलने पर जेवर के विस्थापित परिवारों में नाराजगी, दादा परदादा की दी जमीन फिर भी सुविधाओं के मोहताज

ग्रेटर नोएडा: नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी सामने आ रही है. जेवर के पॉकेट-1, आरआर कॉलोनी में रहने वाले विस्थापित परिवारों का कहना है कि एयरपोर्ट के लिए उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन दी, लेकिन आज भी उन्हें रोजगार, बेहतर सुविधाओं और पुनर्वास से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में एयरपोर्ट का नाम बदलने के फैसले ने उनकी नाराजगी और बढ़ा दी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले से चला आ रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट नाम ही बेहतर था और इसे नहीं बदला जाना चाहिए.

स्थानीय निवासी सतीश कुमार ने कहा कि एयरपोर्ट का नाम बदलना बिल्कुल गलत है. कहा कि प्रधानमंत्री आते-जाते रहेंगे, लेकिन किसी एयरपोर्ट का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर रख देना उचित नहीं है. उनका कहना है कि देश में अब तक कई प्रधानमंत्री बने और उनका कार्यकाल समाप्त हुआ, लेकिन इस तरह किसी परियोजना का नाम बदलना सही परंपरा नहीं है. एयरपोर्ट का पुराना नाम ही बरकरार रखा जाना चाहिए.

नाम बदलनें पर स्थानीयों में असहमति

राजेश सिंह ने भी नाम बदलने पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में किसी दूसरी पार्टी की सरकार बनती है, तो क्या एयरपोर्ट का नाम भी उसके हिसाब से बदल दिया जाएगा? उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों ने एयरपोर्ट के लिए अपनी जमीन दी है. ऐसे में उनकी मांग है कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम पहले की तरह ही रखा जाए. स्वराज सिंह ने कहा कि पहले से चला आ रहा नाम ही सबसे अच्छा था. उन्होंने नाम बदलने के फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि विकास कार्यों की पहचान किसी एक व्यक्ति के नाम से जोड़ने के बजाय उसके मूल नाम को बनाए रखना चाहिए.

प्लॉट मिलने के बाद भी परेशानियां बरकरार

नाम को लेकर नाराजगी के साथ विस्थापित परिवारों ने पुनर्वास व्यवस्था पर भी सवाल उठाए. स्वराज सिंह ने बताया कि उन्हें विस्थापन के बाद 50-50 वर्ग मीटर के प्लॉट दिए गए थे. उनका आरोप है कि प्लॉटों की रजिस्ट्री पांच साल बाद कराने की बात कही गई थी, लेकिन अब तक रजिस्ट्री नहीं हुई है. उन्होंने यह भी कहा कि प्लॉटों पर लीज की व्यवस्था लागू होने के कारण उन्हें बेचने या किराएदार रखने के लिए अनुमति की जरूरत पड़ती है.

स्वराज सिंह के मुताबिक, बुजुर्गों के लिए भी कई तरह की पाबंदियां परेशानी का कारण बन रही हैं. उनका कहना है कि विस्थापन के बाद परिवारों की जीवनशैली बदल गई है और पहले जैसी आजादी महसूस नहीं होती. लोगों को छोटे-मोटे काम करने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

नौकरी और रोजगार के वादों पर उठाए सवाल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण के समय प्रत्येक गांव से एक व्यक्ति को नौकरी देने की बात कही गई थी. उनका कहना है कि एयरपोर्ट बनने के बावजूद कई प्रभावित परिवारों के सदस्यों को रोजगार नहीं मिला. लोगों के अनुसार, उन्हें एयरपोर्ट में काम मिलने की उम्मीद थी, लेकिन सरकारी नौकरी तो दूर, निजी क्षेत्र में भी पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं. अशोक कुमार ने कहा कि वह मौजूदा स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं. विस्थापित परिवारों का कहना है कि गांव छोड़ने के बाद उनकी आजीविका प्रभावित हुई है और कई लोगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है.

हमारी जमीन गई, लेकिन सुविधाएं कहां हैं

स्थानीय निवासियों ने मुआवजे और जमीन की कीमत को लेकर भी नाराजगी जताई. उनका कहना है कि पुश्तैनी जमीन से भावनात्मक जुड़ाव होने के साथ वही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन थी. लोगों ने जमीन के मुआवजे और नई जगह मिली सुविधाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि विस्थापन के बाद उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली. निवासियों ने इलाके में बुनियादी सुविधाओं की कमी, रोजगार के सीमित अवसर और रोजमर्रा की परेशानियों का जिक्र करते हुए कहा कि विकास का लाभ प्रभावित परिवारों तक भी पहुंचना चाहिए. उनका आरोप है कि एयरपोर्ट जैसी बड़ी परियोजना के बीच स्थानीय लोगों की समस्याएं अनसुनी रह गई हैं.

स्थानीय लोगों की मांग है कि एयरपोर्ट का नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ही रखा जाए. साथ ही विस्थापित परिवारों की समस्याओं का समाधान किया जाए, प्लॉटों की रजिस्ट्री की प्रक्रिया स्पष्ट हो, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं और पुनर्वास से जुड़े वादों पर स्थिति स्पष्ट की जाए. उनका कहना है कि उनके लिए नाम का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन जमीन देने के बाद सम्मानजनक जीवन और बुनियादी सुविधाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है.

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