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Delhi Haat Artist Making Paintings From Stubble: दिल्ली हाट की मास्टर क्रिएशन एग्जीबिशन में शशिंद्रन पराली से बेहद खूबसूरत और अनोखी पेंटिंग्स बना रहे हैं. वह पिछले 70 सालों से पराली के अंदरूनी हिस्से से पेड़-पौधे, पक्षी और देवी-देवताओं की कलाकृतियां बनाते हैं.
दिल्ली. दिल्ली हाट में चल रही मास्टर क्रिएशन एग्जीबिशन में आपको कई तरह की खूबसूरत कलाकृतियां देखने को मिल जाएंगी, लेकिन यहां एक ऐसी कला भी है, जिसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे. जिस पराली को अक्सर खेतों में जलाने की खबरें सामने आती हैं और जो पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुंचाती है, उसी पराली से शशिंद्रन बेहद खूबसूरत पेंटिंग्स तैयार कर रहे हैं. उनकी कला की खास बात यह है कि इसमें कलर्स से ज्यादा प्रकृति के असली रंग और बारीक काम देखने को मिलता है.
पराली से पेंटिंग बनाने का अनोखा तरीका
शशिंद्रन पिछले 70 सालों से इस कला से जुड़े हुए हैं. वह धान की पराली के अंदरूनी हिस्से का इस्तेमाल करके अलग-अलग डिजाइन तैयार करते हैं. इसके लिए सबसे पहले पराली को तैयार किया जाता है. फिर उसके अंदर के हिस्से को निकालकर उसे पतली रिबन जैसी पट्टी का आकार दिया जाता है. इसके लिए ब्लेड जैसे औजार का इस्तेमाल होता है.
इसके बाद पराली को काटकर और मोड़कर मनचाहे डिजाइन में ढाला जाता है. इन टुकड़ों को जोड़ने के लिए गोंद का इस्तेमाल किया जाता है. धीरे-धीरे यही छोटे-छोटे हिस्से मिलकर एक पूरी पेंटिंग का रूप ले लेते हैं. इस काम में हाथों की सफाई के साथ धैर्य और काफी मेहनत की जरूरत होती है.
प्रकृति से लेकर देवी-देवताओं तक की तस्वीरें
शशिंद्रन की पेंटिंग्स में सिर्फ एक तरह के डिजाइन नहीं, बल्कि कई तरह की कलाकृतियां देखने को मिलती हैं. वह पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर, प्राकृतिक नजारे और देवी-देवताओं से जुड़ी तस्वीरें बनाते हैं. इसके अलावा महिलाओं के चित्र और दूसरी तरह की तस्वीरें भी तैयार करते हैं. इनकी खासियत यह है कि पराली के प्राकृतिक रंग ही कलाकृति को अलग लुक देते हैं.
एक-एक पेंटिंग बनाने में लगती है बहुत मेहनत
शशिंद्रन के मुताबिक, एक पेंटिंग तैयार करने में करीब एक से दो घंटे या उससे ज्यादा का समय लग सकता है. यह उसके डिजाइन और बारीकी पर निर्भर करता है. उनकी बनाई पेंटिंग्स की कीमत भी आकार और डिजाइन के हिसाब से अलग-अलग होती है. बातचीत के दौरान छोटी पेंटिंग के लिए 100 रुपये से लेकर बड़ी और खास कलाकृतियों के लिए 7,000 रुपये तक की कीमत का जिक्र हुआ.
सालों का अनुभव, कला के नाम सम्मान
शशिंद्रन को इस कला में उनके काम के लिए सम्मान भी मिल चुका है. बातचीत में उन्होंने 1983 में एनएमसी से मिले एक अवॉर्ड का जिक्र किया. छह दशक से इस काम से जुड़े रहकर वह दिखा रहे हैं कि खेती से निकलने वाला एक ऐसा हिस्सा, जिसे अक्सर बेकार समझ लिया जाता है, सही हुनर और मेहनत से खूबसूरत कला में बदला जा सकता है.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…
