Delhi Crime News: दिल्ली में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 1.64 करोड़ रुपये की साइबर ठगी की जांच करते-करते पुलिस एक ऐसे नेक्सेस तक पहुंच गई, जिसका तरीका किसी थ्रिलर स्टोरी से कम नहीं है. नेक्सेस गांवों में पहले हेल्थ कैंप लगाता था, फिर गांववालों को सस्ती दवाइयों का लालच दिया जाता था. इसी के बहाने लोगों के आधार कार्ड सहित पहचान से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती थी.
इन आधार कार्ड का इस्तेमाल सिम कार्ड हासिल करने में किया जाता था. इसके बाद, इन सिम को ई-सिम में कंवर्ट कर दिया जाता था. फिर सोशल मीडिया के जरिए इन ई-सिम को आगे बेच दिया जाता था. पुलिस को शक है कि इनका इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट और दूसरे साइबर फ्रॉड में किया जा रहा था. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) यूनिट ने इस मामले में दो आरोपियों को उत्तर प्रदेश के मथुरा से अरेस्ट किया है.
दो हफ्ते तक डिजिटल अरेस्ट का डर, 6 बैंक खाते और 1.64 करोड़ रुपये
इस कहानी की शुरुआत एक ऐसे साइबर फ्रॉड से हुई, जिसमें ठगों ने कानूनी शिकंजे में फंसाने का डर दिखाकर एक शख्स को अपना शिकार बनाया था. दिल्ली पुलिस के अनुसार, श्रीनिवास को आरोपियों ने व्हाट्स एप के जरिए संपर्क किया. उन्हें कार्रवाई का डर दिखाया गया. करीब दो सप्ताह तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर उन्हें लगातार धमकाया गया. इस बीच, ऐसा माहौल बनाया कि वह उनकी बात मानने को मजबूर हो गए.
आरोप है कि इसी दबाव में शिकायतकर्ता ने छह अलग-अलग बैंक खातों में आरटीजीएस के जरिए कुल 1 करोड़ 64 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए. इस मामले में 1 सितंबर 2026 को दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ यूनिट में ई-एफआईआर दर्ज की. केस भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) और 340 के तहत दर्ज किया गया था. इसके बाद शुरू हुई जांच ने पुलिस को दिल्ली को मथुरा तक पहुंचा दिया.
मोबाइल नंबरों की पड़ताल, फिर आधी रात को मथुरा में छापा
जांच के लिए दिल्ली पुलिस ने एक विशेष टीम बनाई. इसमें सब-इंस्पेक्टर अमित वर्मा, हेड कांस्टेबल गिरिराज और कांस्टेबल आशीष शामिल थे. पुलिस ने मोबाइल नंबरों, मोबाइल डिवाइस और उनसे जुड़े तकनीकी डेटा की कड़ियां जोड़नी शुरू कीं. जांच में मिले सुरागों के आधार पर टीम वृंदावन-मथुरा इलाके तक पहुंची. 20 और 21 अक्टूबर 2026 की दरमियानी रात मथुरा के फरह इलाके के गांव कोटा में छापा मारा गया. पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार हुए आरोपियों की पहचान जितेंद्र सिंह (29) और ब्रजेश कुमार (21) के रूप में हुई है. दोनों मथुरा जिले के फरह इलाके के फतीहा गांव के रहने वाले हैं. पूछताछ के लिए दोनों आरोपियों को पुलिस दिल्ली ले आई है.
दवा का लालच देकर लेते थे आधार और बायोमेट्रिक डिटेल
पूछताछ के दौरान, पुलिस को आरोपियों ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में फर्जी हेल्थ कैंप लगाए जाते थे. लोगों को कम कीमत पर दवाइयां देने की बात कहकर इन कैंपों तक बुलाया जाता था. दवा के फायदे की उम्मीद में पहुंचने वाले लोगों से आधार कार्ड और बायोमेट्रिक जानकारी ली जाती थी. पुलिस को संदेह है कि इसी जानकारी का इस्तेमाल कर सिम कार्ड और ई-सिम कार्ड हासिल करने के लिए किया जाता था. पुलिस अब यह पता लगा रही है कि इन कैंपों में कितने लोगों की जानकारी जुटाई गई, कितने सिम जारी हुए और क्या इस काम में दूसरे लोग भी शामिल थे.
800 रुपये का सिम, 2,000 रुपये तक में बिक्री!
पुलिस के मुताबिक, आरोपी पहले फिजिकल सिम कार्ड हासिल करते थे. फिर उन्हें एक्टिवेट कराकर ई-सिम में बदला जाता था. इसके बाद फेसबुक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए एक्टिवेटेड ई-सिम और उनसे जुड़े क्यूआर कोड दूसरे लोगों तक पहुंचाए जाते थे. जांच में सामने आया है कि एक एक्टिवेटेड सिम या ई-सिम को 800 से 1,200 रुपये में हासिल किया जाता था. फिर उसे करीब 2,000 रुपये तक में बेच दिया जाता था. पुलिस के अनुसार, दोनों आरोपी बीते करीब एक साल से इस गोरखधंधे में शामिल थे.
