भारत में सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ता जा रहा है. ग्रिड की बिजली पर निर्भर रहने के बजाय आजकल घरों में बिजली की सप्लाई के लिए लोग छतों पर सोलर पैनल लगवा रहे हैं. अब इसे लेकर आई स्टडी बेहद सकारात्मक तस्वीर दिखा रही है. जिसमें बताया गया है कि आने वाले दो सालों में सोलर पैनलों का बाजार दोगुने से भी ज्यादा का होने जा रहा है. यानि आने वाले दिनों में सोलर ऊर्जा पर सिर्फ घरों में बल्ब जलाने के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य कामों के लिए भी सौर ऊर्जा से पैदा हुई बिजली का उपयोग किया जा सकेगा.
काउंसिल ऑन एनर्जी इनवायरनमेंट एंड वॉटर की स्टडी कहती है कि भारत में सोलर पैनल पार्ट्स का बाजार सितंबर 2026 के लगभग 3.6 अरब डॉलर से दोगुने से बढ़कर मार्च 2028 तक लगभग 7.8 अरब डॉलर (2.2 गुना) हो सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की कैमिकल इंडस्ट्री के पास देश में ही बैटरी इलेक्ट्रोलाइट बनाने के लिए जरूरी अधिकतर सामग्री पहले से उपलब्ध है. ऐसे में नियोजित प्लांट के समय पर चालू होने से भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भता मिलने की पूरी संभावना है.
स्टडी कहती है कि भारत में सोलर पैनल में लगने वाले पार्ट्स का बाजार सितंबर 2026 के लगभग 3.6 अरब डॉलर (34,200 करोड़ रुपये) से दोगुने से ज्यादा बढ़कर मार्च 2028 तक 7.8 अरब डॉलर (74,100 करोड़ रुपये) हो सकता है. उद्योग में इन पार्ट्स को बिल ऑफ मैटेरियल्स (बीओएम) कहा जाता है, जिसमें सोलर ग्लास, एल्युमिनियम फ्रेम, करंट ले जाने वाले कॉपर रिबन, सेल को सील करने वाली एनकैप्सुलेंट शीट, और पीछे की ओर लगने वाले बैकशीट व जंक्शन बॉक्स शामिल हैं.
12 साल में गई गुनी बढ़ गई सौर ऊर्जा की क्षमता
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक “2014 में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2.8 गीगावाट थी, आज यह 172 गीगावाट है. अगर आप सुस्थिर अक्षय ऊर्जा दे सकते हैं, तो उद्योग उसे ही प्राथमिकता देता है. क्योंकि यह स्वच्छ ऊर्जा है, और यह अपेक्षाकृत सस्ती है. जब कहीं पर बाजार होता है, तो वहां पर निवेश होता है और जब निवेश होता है, तो वहां प्रगति भी होगी.’
स्टडी कहती है कि 2028 तक भारत अधिकतर पार्ट्स के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है. सितंबर 2026 में देश में इनकी सालाना मैन्युफैक्चरिंग क्षमता ग्लास के लिए 20 गीगावाट से लेकर जंक्शन बॉक्स के लिए 153 गीगावाट तक थी. अगर नियोजित विस्तार समय पर पूरे हो जाते हैं, तो फ्रेम, रिबन और एनकैप्सुलेंट मार्च 2027 तक भारत की लगभग 67 गीगावाट की अनुमानित सालाना मॉड्यूल मांग को पूरा कर सकते हैं,
अभी तक भारत में ज्यादातर हिस्सा होता है आयात
सरकारी आंकड़ो के मुताबिक वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2026 के बीच, भारत में ग्लास का आयात प्रतिवर्ष 63 प्रतिशत की दर से बढ़ा और 129 मिलियन डॉलर से 1.48 अरब डॉलर पर पहुंच गया. एल्युमिनियम फ्रेम का आयात प्रतिवर्ष 88 प्रतिशत और जंक्शन बॉक्स का आयात 92 प्रतिशत की दर से बढ़ा. वित्त वर्ष 2026 में, भारत के ग्लास आयात का 66 प्रतिशत और फ्रेम आयात का 70 प्रतिशत चीन से आया, जबकि एनकैप्सुलेंट आयात का 34 प्रतिशत वियतनाम से और 31 प्रतिशत थाईलैंड से आया. घरेलू आपूर्ति तैयार होने से मॉड्यूल निर्माताओं पर कीमतों के उतार-चढ़ाव और दूसरी जगहों के व्यापारिक फैसलों से जुड़े जोखिम में कमी आएगी.
इस बारे में सीईईडब्ल्यू के फेलो ऋषभ जैन कहते हैं, “भारत ने दिखाया है कि वह बड़े पैमाने पर सोलर मॉड्यूल असेंबल कर सकता है. अगली परीक्षा यह है कि क्या हम इसके पार्ट्स भी बड़े पैमाने पर और अच्छी गुणवत्ता के साथ बना सकते हैं. अच्छी बात यह है कि निवेश की प्रतिबद्धताएं आ चुकी हैं और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं भी तैयार होने जा रही हैं. लगातार निवेश और स्थानीय मांग मिलकर भारत को सोलर बिल ऑफ मैटेरियल्स (बीओएम) के लिए एक वैकल्पिक सप्लाई चेन बना सकते हैं.”
वहीं सीनियर प्रोग्राम लीड डॉ. आकांक्षा त्यागी कहती हैं कि भारत के पास इलेक्ट्रोलाइट मैन्युफैक्चरिंग में एक वैश्विक खिलाड़ी बनने का अनूठा अवसर मौजूद है. इसकी कैमिकल इंडस्ट्री और शोध संस्थानों के पास कच्चे माल, मशीनों, प्रक्रियाओं और प्रतिभा के रूप में क्षमताएं पहले से मौजूद हैं. इनका इस्तेमाल करके इलेक्ट्रोलाइट के व्यावसायिक उत्पादन में शुरुआती बढ़त हासिल की जा सकती है.
