मोहम्मद रफी का वो सुपरहिट गाना, आवाज में तड़प-कसक के लिए 47 रीटेक, सॉन-मूवी दोनों हुए अमर

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Mohammed Rafi Guide Movie Song : 1950 से 1970 के दशक तक रफी साहब ने बॉलीवुड इंडस्ट्री पर एकतरफा राज किया. मोहम्मद रफी का आवाज में जादू था. उनकी आवाज में प्यार-दर्द का गजब का मिश्रण था. प्रेम और इबादत को भी वो उतने ही अच्छे से सुरों में ढाल देते थे. रफी साहब परफेक्शन पर बहुत जोर देते थे. एक बार तो रफी साहब ने एक दर्दभरे सॉन्ग के परफेक्शन के लिए 47 रीटेक लिए थे. यह किस्सा 61 साल पहले आई हिंदी सिनेमा की एक कालजयी फिल्म का है. इस फिल्म की कहानी अपने समय से बहुत आगे की थी. इस मूवी की हिंदी सिनेमा की महान फिल्मों में होती है. यह फिल्म कौन सी थी और वो गाना कौन सा था, आइये जानते हैं……

बात 1964 के आसपास की है. संगीतकार एसडी बर्मन ‘गाइड’ फिल्म का म्यूजिक तैयार कर रहे थे. फिल्म के लगभग सभी गानों का म्यूजिक कंपोज कर लिया गया था. सिर्फ एक गाना बचा था. धुन बन चुकी थी, बस गीतकार शैलेंद्र की ओर से गीत लिखा जाना बाकी था. फिल्म के दो गाने रफी साहब अपनी सुरीली आवाज में रिकॉर्ड कर चुके थे.

मोहम्मद रफी ‘तेरे मेरे सपने, अब एक रंग हैं’ और ‘क्या से क्या हो गया, बेवफा तेरे प्यार में’ दो गाने रिकॉर्ड कर चुके थे. काफी मेहनत के बाद गीतकार शैलेंद्र ने वो गाना लिखा, जिसने हिंदी सिनेमा के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया. मोहम्मद रफी की आवाज, एसडी बर्मन का म्यूजिक और गीतकार शैलेंद्र की कलम से निकला यह गाना आज भी दिल में बेचैनी पैदा कर देता है. यह गाना था ‘दिन ढल जाये हाय, रात ना जाए, तू तो न आए तेरी, याद सताये’.

इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान मोहम्मद रफी ने पूरे 47 रीटेक लिए थे. उन्हें लग रहा था कि उनके गाने में बेचैनी पैदा कर देने वाली तड़प-कसक पैदा नहीं हुई है. इस गाने की रिकॉर्डिंग के लिए जब रफी साहब स्टूडियो पहुंचे तो एसडी बर्मन उनका बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. बार-बार रीटेक लिए जाने से म्यूजिशियन थक गए. हर बार रफी साहब इशारे से एसडी बर्मन से पूछते तो जवाब आता कि एक और बार. ऐसा करते-करते 47 रीटेक लिए गए.

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इसी गाने में एक लाइन ‘ऐसे में किसको कौन मनाए’ है, जिसे गाते समय रफी साहब के सुर कांप उठे. आवाज की थर-थराहट साफ पता चलती है, यह आवाज दिल में एक चुभन का अहसास कराती है.

देवानंद की क्लासिक फिल्म ‘गाइड’ 2 अप्रैल 1965 को रिलीज हुई थी. फिल्म का निर्देशन देवानंद के भाई विजय आनंद उर्फ गोल्डी ने किया था. उन्होंने ही फिल्म का स्क्रीनप्ले तैयार किया था. फिल्म की स्टोरी आरके नारायण की बुक ‘गाइड’ से ली गई थी. गाइड बुक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार पंडित नेहरू ने दिया था.

इस फिल्म के बनने का किस्सा और भी दिलचस्प है. 1961 की फिल्म ‘हम दोनों’ बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई थी. यहां पर देवानंद की मुलाकात दुनियाभर के दिग्गज फिल्मकारों से हुई. बर्लिन में ही देवानंद ने आरके नारायण का उपन्यास ‘गाइड’ पढ़ा और उस पर फिल्म बनाने का फैसला किया. गोल्डी ने जब यह उपन्यास पढ़ा तो उन्हें पसंद नहीं आया. इससे देवानंद गुस्सा हो गए. दोनों के बीच काफी दिन तक बातचीत बंद रही. बाद में देवानंद ने हार मानी और उन्होंने गोल्डी से फिल्म बनाने का अनुरोध किया. गोल्डी ने स्क्रिप्ट में बदलाव करने की बात कही. गोल्डी ने इस दौरान मुंबई के खंडाला में 18 दिन में होटल में रुककर गाइड फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. उन्होंने स्टोरी में कई बदलाव किए. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की महान फिल्म साबित हुई.

गाइड फिल्म हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में बनाई गई थी. इंग्लिश फिल्म का प्रीमियर न्यूयॉर्क में हुआ था. देवानंद ने इसमें शिरकत भी की थी. फिल्म फ्लॉप साबित हुई तो हिंदी में बनी फिल्म में बदलाव की मांग डिस्ट्रीब्यूटर्स करने लगे. वो चाहते थे कि राजू गाइड को फिल्म को जिंदा दिखाया जाए, लेकिन गोल्डी नहीं माने. विजय आनंद का कहना था कि राजू अब माया मोह से ऊपर उठ गया है. गाइड रिलीज हुई और 10 हफ्ते निकल गए. सबको लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप हो गई. बारिश नहीं हो रही थी. गर्मी से बुरा हाल था, ऐसे में देवानंद ने अखबारों में विज्ञापन दिया कि ‘गाइड प्रे फॉर रेन’. इत्तफाक से बारिश हो गई. धीरे-धीरे गाइड की स्टोरी दर्शकों को पंसद आने लगी.

गाइड फिल्म का बजट 85 लाख था और नेट कलेक्शन 1.75 करोड़ रुपये रहा था. गाइड 1965 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की लिस्ट में 5वें नंबर पर थी. फिल्म हिट साबित हुई लेकिन गुजरते समय के साथ इसका महत्व दर्शकों को समझ में आया. रिपीट रन में फिल्म हाउसफुल रही. गाइड मूवी आगे चलकर भारतीय सिनेमा की कल्ट क्लासिक में शामिल हो गई. 14वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में गाइड को 9 नॉमिनेशन मिले थे जिनमें से यह फिल्म 7 अवॉर्ड जीतने में कामयाब रही थी. यह उस साल की सबसे ज्यादा अवॉर्ड पाने वाली फिल्म थी.

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