लखनऊ/नई दिल्ली : केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के लिए लाए गए कानून में संशोधन लाने जा रही है. इसके जरिये महिला सांसदों की संख्या अब एक तिहाई किए जाने का प्रस्ताव है. बताया जा रहा है कि इस संशोधित बिल को 29 मार्च को ही इसी सत्र में लाया जाएगा. इससे लोकसभा में कुल सांसदों की संख्या बढ़कर 816 हो सकती है. वहीं, महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी. केवल यही नहीं, राज्य विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या बढ़ सकती है. ऐसे में महिला आरक्षण के लागू हो जाने से उत्तर प्रदेश की सियासी तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों में करीब 50 फीसदी बढ़ोतरी के साथ महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाएगा. अगर यह व्यवस्था 2029 के आम चुनाव से पहले लागू होती है, तो देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में राजनीति का पूरा ढांचा बदल सकता है.
महिला आरक्षण के बाद यूपी की सियासी तस्वीर कैसे बदल जाएगी, आइये जानते हैं इस बारे में…
सीटों का नया गणित
प्रस्ताव के मुताबिक, यूपी में लोकसभा सीटों की संख्या 80 से बढ़कर 120 हो सकती है. इनमें से 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. वहीं विधानसभा की 403 सीटें बढ़कर 605 तक पहुंच सकती हैं, जिनमें 202 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी. यह बदलाव परिसीमन के बाद लागू होगा, जिसमें 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात सामने आई है.
राजनीतिक समीकरण में क्या बड़ा बदलाव हो सकता है?
महिला आरक्षण लागू होने के बाद प्रदेश की राजनीति में पारंपरिक जातीय और पुरुष वर्चस्व वाले समीकरण कमजोर पड़ सकते हैं. अब हर तीसरी सीट पर महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ेंगी, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी पड़ेगी. भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों को बड़े पैमाने पर महिला नेतृत्व तैयार करना होगा. साथ ही कई मौजूदा पुरुष नेताओं की सीटें आरक्षित होने से उनका राजनीतिक भविष्य भी प्रभावित हो सकता है.
भौगोलिक और परिसीमन का क्या असर होगा?
परिसीमन के चलते यूपी के अलग-अलग क्षेत्रों में सीटों का संतुलन बदल सकता है. पश्चिमी यूपी, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ेगी, जिससे नए राजनीतिक केंद्र उभर सकते हैं. शहरी इलाकों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है, जिससे महिला उम्मीदवारों को भी नई राजनीतिक जमीन मिल सकती है. महिला आरक्षण के बाद चुनावी एजेंडा भी बदलने की उम्मीद है. अब तक जाति और धर्म आधारित राजनीति हावी रही है, लेकिन आने वाले समय में महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे केंद्र में आ सकते हैं. महिला मतदाता भी अब सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि निर्णायक राजनीतिक ताकत के रूप में उभरेंगी.
2029 चुनाव पर नजर
अगर सरकार समय रहते संशोधन और परिसीमन प्रक्रिया पूरी कर लेती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह नए ढांचे में लड़ा जाएगा. ऐसे में यूपी की राजनीति में नई पीढ़ी और महिला नेतृत्व का उभार तय माना जा रहा है. महिला आरक्षण सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह यूपी की राजनीति में संरचनात्मक बदलाव का संकेत है. आने वाले वर्षों में यह बदलाव न सिर्फ चुनावी रणनीति बल्कि सत्ता के स्वरूप को भी नई दिशा दे सकता है.
