अब दिल्ली की सड़कें ही पी लेंगी सारी जहरीली हवाएं, IIT मद्रास ने बनाया प्रदूषण को पानी में बदलने का प्लान

नई दिल्ली. दिल्ली की जहरीली हवा अब सिर्फ नियमों और पाबंदियों से नहीं संभल रही. ऑड-ईवन, पटाखा बैन और अन्य उपायों के बावजूद 2025 में राजधानी में एक भी दिन ‘अच्छे एक्यूआई’ वाला दर्ज नहीं हुआ. ऐसे में अब सरकार ने एक अनोखा और तकनीकी दांव खेला है, ऐसी सतहें जो हवा में मौजूद प्रदूषण को ‘खा’ जाएं.

13 मार्च 2026 को दिल्ली सरकार ने आईआईटी-मद्रास के साथ एक समझौता (MoU) साइन किया. इसके तहत छह महीने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें फोटोकैटलिटिक सतहों (Photocatalytic Surfaces) का इस्तेमाल होगा. इस तकनीक में खास तौर पर टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO₂) का उपयोग किया जाएगा, एक ऐसा मटेरियल जो सूरज की रोशनी पड़ते ही प्रदूषकों को तोड़ने लगता है.

कैसे काम करती है ये ‘स्मॉग-ईटर’ तकनीक?
इसे आसान भाषा में समझें – TiO₂ एक ‘मॉलिक्यूलर बाउंसर’ की तरह काम करता है. सूरज की UV किरणें पड़ते ही यह सक्रिय हो जाता है. यह रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज़ (ROS) बनाता है. ये ROS हवा में मौजूद खतरनाक गैसों जैसे: नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) को पकड़कर कम हानिकारक पदार्थों (जैसे नाइट्रेट्स और पानी) में बदल देते हैं. खास बात यह है कि इस तकनीक के इस्तेमाल में कोई बिजली नहीं चाहिए, कोई ऑपरेशन लागत भी नहीं है. इसका मतलब कि पूरी तरह ‘पैसिव’ सिस्टम के अंतर्गत यह काम करेगा.

कितना असरदार है ये तरीका?
‘इंडिया टुडे’ में प्रकाशित खबर के मुताबिक, रिसर्च के दौरान TiO₂ कोटेड कंक्रीट लैब में 77.5% तक NOx हटाने में सफल रहा. फील्ड टेस्ट में भी प्राकृतिक रोशनी में प्रदूषण में कमी देखी गई.

दिल्ली में कैसे होगा इस्तेमाल?
IIT मद्रास की टीम पहले इसे लैब में टेस्ट करेगी, फिर रियल-वर्ल्ड ट्रायल होंगे:
सड़कों और फुटपाथों पर कोटिंग
बिल्डिंग्स की बाहरी दीवारों पर लेयर
स्ट्रीट लाइट पोल और छतों पर पैनल
कंक्रीट, मेटल और ग्लास सतहों पर प्रयोग

यानी पूरा शहर धीरे-धीरे ‘एंटी-पॉल्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर’ में बदल सकता है

क्यों जरूरी है ये कदम?
दिल्ली का प्रदूषण सिर्फ मौसमी नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल संकट बन चुका है. गाड़ियों से निकलने वाला NO₂ बड़ा कारण है. इसके अलावा
सालभर AQI ‘खराब’ से ‘खतरनाक’ के बीच बना रहता है, जिससे लोगों का सांस लेना भी दूभर हो जाता है.

ऐसे में यह तकनीक
24×7 काम कर सकती है
लोगों के व्यवहार बदलने की जरूरत नहीं
बड़े स्तर पर लागू की जा सकती है

उम्मीद या प्रयोग?
यह प्रोजेक्ट अभी पायलट स्टेज में है, लेकिन अगर सफल रहा तो यह दुनिया के बड़े शहरों के लिए भी मॉडल बन सकता है.

सवाल अब भी है
क्या सच में सड़कें और इमारतें दिल्ली की जहरीली हवा को खत्म कर पाएंगी? लेकिन एक बात साफ है कि दिल्ली अब प्रदूषण से लड़ने के लिए “साइंस” पर बड़ा दांव खेल रही है.

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