क्या ‘स्मॉग-ईटिंग’ टेक्नोलॉजी से साफ होगी दिल्ली की हवा? नया प्रयोग शुरू, काफी लग सकता है पैसा

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क्या ‘स्मॉग-ईटिंग’ टेक्नोलॉजी से साफ होगी दिल्ली की हवा? नया प्रयोग शुरू

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स्मॉग ईटिंग टेक्नोलॉजी में एक तरह के पदार्थ को सड़कों, इमारतों की दीवारों और कई जगह लगाया जाता है जिससे वह हवा में मौजूद प्रदूषण को अपनी तरफ खींचता है और हवा को साफ करता है. लेकिन एनवायरमेंटलिस्ट सुनील का कहना था कि सवाल यह है कि क्या इससे दिल्ली का प्रदूषण उसे तरह से कम हो सकता है जिसमें लोग आराम से सांस ले सके.

दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण को लेकर कई बड़े साइंटिस्ट से लेकर एनवायरमेंटलिस्ट तक अब ये मान चुके हैं कि दिल्ली की हवा अब सांस लेने लायक नहीं है. इसमें इतना प्रदूषण है कि यह कुछ सालों में दिल्ली में रहने वाले लोगों को बेहद गंभीर बीमारियां दे सकती है. इसलिए सरकार लगातार दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए अलग-अलग साइंटिफिक तकनीक के इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है.

अगर आपको याद हो तो पिछले साल ही सरकार ने क्लाउड-सीडिंग से दिल्ली का प्रदूषण कम करने की कोशिश की थी और अब सरकार आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर दिल्ली में ‘स्मॉग-ईटिंग’ तकनीक को इस्तेमाल करने वाली है जिससे यह उम्मीद की जारी है कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण में कमी आएगी. लेकिन इसी के चलते जब हमने दिल्ली-एनसीआर के Enviro Catalysts संस्था के संस्थापक सुनील दहिया से बात की तो उन्होंने इस पर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं.

क्या होती है स्मॉग ईटिंग टेक्नोलॉजी?
सुनील दहिया बताया कि इस स्मॉग ईटिंग टेक्नोलॉजी ऐसी तकनीक है जो हवा में मौजूद प्रदूषक कणों जैसे कि PM2.5, PM10 आदि को कम करने या निष्क्रिय करने के लिए विकसित की गई है. वहीं उनका यह भी कहना था कि इसमें आमतौर पर फोटोकैटालिटिक मटेरियल जैसे की टाइटेनियम डाइऑक्साइड का इस्तेमाल होता है, जो सूरज की रोशनी के संपर्क में आकर हानिकारक गैसों और कणों को कम हानिकारक पदार्थों में बदल देता है. उन्होंने आगे कहा कि फोटोकैटालिटिक मटेरियल एक तरह का पदार्थ होता है जिसे सड़कों, इमारतों की दीवारों, पेंट, टाइल्स या एयर-प्यूरिफाइंग टावरों में लगाया जाता है ताकि आसपास की हवा में प्रदूषण को यह पदार्थ अपनी तरफ खींचें और हवा को साफ कर दे.

प्रदूषण कम करने के लिए इतनी कारगर नहीं तकनीक
सुनील दहिया ने बताया कि जिस तरह से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण है और इतनी बड़ी दिल्ली में इस तकनीक को इस्तेमाल करने के लिए काफी पैसा लग सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से क्लाउड सीडिंग में पैसा लगा था, उस तरह से इस तकनीक में भी काफी ज्यादा पैसा लग सकता है. हालांकि, उनका यह कहना था कि कितना पैसा लगेगा. यह कहना तो संभव नहीं है. लेकिन यह भी जरूर है कि दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण को कम करने के लिए ऐसे कुछ एक्सपेरिमेंट करने ही चाहिए.

अंत में सुनील ने कहा कि इस तकनीक से दिल्ली-एनसीआर का कितना प्रदूषण कम हो सकता है. यह एक बड़ा सवाल है? क्योंकि इससे प्रदूषण जहां से हो रहा है वहां पर काबू नहीं होगा बल्कि जब प्रदूषण हवा में फैलेगा फिर यह प्रदूषण पर कुछ काबू कर सकता है. उनका कहना था कि प्रदूषण जिन चीजों से दिल्ली-एनसीआर में होता है, हमें उन चीजों को कम करने की जरूरत है और इसी पर उन्होंने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण गाड़ियों, कंस्ट्रक्शन के कामों और कई प्रकार की काम ना आने वाली चीजों को जलाकर उस जो धुआ हवा में फैला है, उसे होता है और उसी को कम करने की जरूरत है.

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Mohd Majid

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