होर्मुज संकट टला भी नहीं, भारत पर मंडराई एक और मुसीबत, मई-जुलाई तक त्राहिमाम कर उठेगी जनता

Monsoon Crisis India: होर्मुज का तूफान अभी थमा भी नहीं है कि भारत के ऊपर एक और मुसीबत का काला साया मंडरा रहा है. ईरान-यूएस-इजरायल युद्ध के चलते पूरी दुनिया में पहले ही तेल-गैस की किल्लत और महंगाई चरम पर पहुंच गई है, वहीं अब भारत मौसम विज्ञान विभाग की ओर से जारी की गई भविष्यवाणी ने डर पैदा कर दिया है. आईएमडी ने अल निनो के मजबूत होने का अनुमान जताया है जो भारत के लिए बड़े नुकसान की आशंका पैदा कर रहा है.

मौसम विज्ञान विभाग की मानें तो जून से सितंबर तक होने वाली मौसमी बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) की 92 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जो नीचे सामान्य श्रेणी में आती है. पिछले दो सालों में ऊपर सामान्य बारिश के बाद यह पहला मौका है जब IMD ने नीचे सामान्य पूर्वानुमान दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एल नीनो मजबूत हुआ तो जुलाई-सितंबर में बारिश और कमजोर हो सकती है.

‘अल नीनो’ एक ऐसी वैश्विक समुद्री स्थिति है, जो भारत में सूखे और कम बारिश के लिए जिम्मेदार मानी जाती है. इसका मतलब है कि जब फसलों को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होगी, तब आसमान से आग बरसेगी और बादल नदारद रहेंगे. ऐसे में वैज्ञानिकों की मानें तो ये समुद्री स्थितियां थोड़ा प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं, हालांकि उत्तरी गोलार्ध में बर्फ के कवर की अनुकूल स्थिति इसका कुछ हद तक ऑफसेटिंग कर सकती है.

आईएमडी की मानें तो देश के कुछ हिस्सों विशेषकर उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से ऊपर बारिश की संभावना है, लेकिन कई अन्य इलाकों में नीचे सामान्य रहने की संभावना ज्यादा है.

अल नीनो (El Nino) का इतिहास बताता है..
भारत में मानसून पर अल नीनो का असर लंबे समय से देखा जाता रहा है. 1951 से 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) के दौरान बारिश में उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है.

डेटा बताता है कि अधिकांश अल नीनो वर्षों में देश में सामान्य से कम बारिश हुई है. खासकर 1965, 1972, 1987, 2002 और 2015 जैसे वर्षों में मानसून कमजोर रहा और बारिश में कमी दर्ज की गई. ये वे साल थे जब एल नीनो की तीव्रता मध्यम या अधिक थी.

अल नीनो का प्रभाव बदलता भी है
हालांकि, हर बार अल नीनो का असर एक जैसा नहीं रहा. कुछ वर्षों में, जैसे 1953 और 1994 में, सामान्य से अधिक बारिश भी दर्ज की गई. इससे यह स्पष्ट होता है कि अल नीनो का प्रभाव अन्य मौसमीय कारकों के साथ मिलकर तय होता है. हाल के वर्षों की बात करें तो 2023 में अल नीनो के दौरान मानसून में लगभग 5.3% की कमी दर्ज की गई, जो कमजोर एल नीनो का संकेत है.

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो की स्थिति में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से मानसून की प्रणाली प्रभावित होती है, जिससे भारत में बारिश कम हो सकती है. अल नीनो का भारतीय मानसून पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है, लेकिन इसकी तीव्रता और अन्य जलवायु कारकों के आधार पर असर में बदलाव संभव है.

क्या करें बचाव के लिए
सरकार पहले से ही जल संरक्षण, फसल बीमा और सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है. किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे सूखा प्रतिरोधी बीजों और वैकल्पिक फसलों पर विचार करें.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *