केस से हटना आसान होता, लेकिन मैंने दूसरा रास्ता चुना: केजरीवाल की याचिका पर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की 10 बड़ी बातें

नई दिल्ली. आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को इस केस से हटाने की मांग की थी. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच ही निचली अदालत से आरोप मुक्त किए जाने के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई कर रही है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के फैसले की 10 बड़ी बातें:

1. बिना सुनवाई के केस से हटना आसान होता, लेकिन मैंने दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने कहा कि एक बार जब आरोप लगने पर जज की इज्जत चली जाती है, तो अगर उससे निपटा नहीं गया, तो उसे वापस पाना बहुत मुश्किल होगा.

2. मुझे पता है कि आज मुझे केस लड़ने वाले को जज नहीं करना है, लेकिन केस लड़ने वाले ने मुझे और इस संस्था को ट्रायल पर रखा है.

3. जब मैंने यह फ़ैसला लिखना शुरू किया, तो कोर्टरूम में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था. जो बचा था, वह था एक जज होने का शांत और गंभीर दायित्व – एक ऐसा जज जिसने भारत के संविधान की शपथ ली थी. मुझे एहसास हुआ कि एक जज के तौर पर मेरी चुप्पी की ही परीक्षा हो रही थी, और अब सवाल जज की निष्पक्षता और खुद संस्था की साख को लेकर था.

4. मुझे ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा, जहां मेरी निष्पक्षता और गरिमा को चुनौती दी गई. स्वाभाविक प्रवृत्ति तो यही थी कि आवेदनों की सुनवाई किए बिना ही मैं खुद को इस मामले से अलग कर लूं. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने दलीलें सुनने का फ़ैसला किया.

5. मैंने फ़ैसला किया कि मैं इन आरोपों से प्रभावित हुए बिना ही इस मामले पर निर्णय लूंगी – ठीक वैसे ही, जैसा कि मैंने अपने 34 साल के न्यायिक करियर में हमेशा किया है.

6. दलीलों के दौरान, आवेदकों ने यह स्पष्ट किया कि उन्हें मेरी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है. मेरे काम को मुश्किल बनाने वाली बात यह थी कि दलीलों के दौरान ही, अलग-अलग और परस्पर विरोधी रुख अपनाए जा रहे थे.

7. मेरा न्यायिक करियर 34 वर्षों से अधिक का है, जिसमें मुझे सिर्फ कानूनी ही नहीं, बल्कि नैतिक कसौटियों पर भी परखा गया है.

8. क्या अब जजों को यह साबित करने के लिए कि वे किसी मामले की सुनवाई के योग्य हैं, पक्षकारों द्वारा लगाए गए अतिरिक्त टेस्ट भी पास करने होंगे?

9. अगर ऐसे तर्क स्वीकार किए जाते हैं, तो जज को पहले पक्षकार द्वारा तय किए गए टेस्ट को पास करना होगा, तभी वह मामले की सुनवाई कर सकेगा.

10. मुझे ऐसी स्थिति में रखा गया है कि अगर मैं खुद को अलग (recuse) करती हूं तो क्या होगा और अगर नहीं करती हूं तो क्या होगा?

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