Earth Day Special: अभी है संभलने का मौका? खत्म होता हिमालय और बर्बाद होती दिल्ली की हवा

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अर्थ डे स्पेशल: खत्म होता हिमालय और बर्बाद होती दिल्ली की हवा, अभी भी है मौका

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राजधानी दिल्ली में भी पर्यावरणीय हालात चिंताजनक हैं. सर्दियों में बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. इसके अलावा यमुना नदी का प्रदूषण, घटता भूजल स्तर और शहरी विस्तार पर्यावरणीय असंतुलन को और बढ़ा रहे हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि विकास की तेज रफ्तार के बीच पर्यावरण को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है.

नई दिल्ली. विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंतन की जरूरत महसूस की जा रही है. दीक्षु कुकरेजा ने साफ शब्दों में कहा कि अगर विकास के नाम पर प्रकृति का लगातार दोहन जारी रहा, तो इसके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज इंसान अपनी जरूरतों और सुविधाओं के लिए प्रकृति के साथ समझौता कर रहा है, जिसे अब रोकना बेहद जरूरी है.

हिमालय जीवन का आधार, अब खतरे में
हिमालय को दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी के लिए जीवनरेखा माना जाता है. लेकिन आज यही क्षेत्र अंधाधुंध विकास की मार झेल रहा है. चौड़ी सड़कों, बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और बढ़ते पर्यटन को तरक्की का प्रतीक माना जा रहा है, जबकि असल में ये गतिविधियां पहाड़ों की संवेदनशील पारिस्थितिकी को कमजोर कर रही हैं.

अब हर मौसम में भूस्खलन, क्लाउडबर्स्ट और असामान्य प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल रही हैं. कुकरेजा के मुताबिक, पहाड़ों को समझे बिना वहां मैदानी सोच से विकास करना सीधे तौर पर विनाश को न्योता देना है.

दिल्ली प्रदूषण का बढ़ता संकट
राजधानी दिल्ली में भी पर्यावरणीय हालात चिंताजनक हैं. सर्दियों में बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. इसके अलावा यमुना नदी का प्रदूषण, घटता भूजल स्तर और शहरी विस्तार पर्यावरणीय असंतुलन को और बढ़ा रहे हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि विकास की तेज रफ्तार के बीच पर्यावरण को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है.

विकास बनाम पर्यावरण नहीं, साथ-साथ चलें
कुकरेजा ने यह भी स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना गलत सोच है. सही योजना और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभावों का गहराई से आकलन होना चाहिए. अगर नीति निर्माण में डेटा और संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जाए, तो विकास भी होगा और प्रकृति भी सुरक्षित रहेगी.

बदलाव की शुरुआत घर से
कुकरेजा ने आम लोगों से अपील की कि वे अपनी जिम्मेदारी समझें और छोटे-छोटे कदमों से बदलाव लाएं. घर में कचरा प्रबंधन, पानी की बचत और प्रदूषण कम करने की आदतें अपनाकर बड़ा बदलाव संभव है. उनका मानना है कि जब समाज, स्कूल और समुदाय मिलकर काम करेंगे, तभी स्थायी समाधान सामने आएंगे.

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Rajneesh Singh

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