ऑटिज्म के लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में पहचान सकते हैं, एम्स ने बताया कैसे?

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ऑटिज्म के लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में पहचान सकते हैं, एम्स ने बताया कैसे?

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एम्स नई दिल्ली ने छोटे बच्‍चों में ऑटिज्म की पहचान करने के लक्षण बताए हैं. डॉक्‍टरों ने 12 से 18 माह में पहचान करके के तरीके बताए हैं. एम्‍स में 2000 से ज्यादा बच्चों का मूल्यांकन करने के बाद शुरुआती पहचान और बहु-विषयक इलाज पर जोर द‍िया गया है.

एम्‍स ने बच्‍चों में ऑट‍िज्‍म की पहचान के लक्षण बताए हैं.

AIIMS Delhi: ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली में ऑटिज्म और मानवता को लेकर लोगों को जागरुक किया गया. जिसमें बताया गया कि 12 से 18 माह की उम्र में ही बच्चे में ऑटिज्म के लक्षणों को पहचाना जा सकता है. हर जीवन का महत्व बताते हुए एम्स के बाल रोग विभाग के बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग के डॉक्टरों ने ऑटिज्म के लक्षणों पर जोर दिया.

डॉक्टरों ने बताया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जिसकी पहचान आमतौर पर बच्चे के 12 से 18 महीने की उम्र में ही की जा सकती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के 2025 के अनुमान के अनुसार, दुनिया में लगभग हर 31 में से 1 व्यक्ति को ऑटिज्म का इलाज मिल रहा है.

उन्होंने कहा कि यह स्थिति हर बच्चे में अलग-अलग रूप में दिखती है. कुछ बच्चे हल्के लक्षणों के साथ सामान्य जीवन जीते हैं, तो कुछ को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

एम्स के बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग में अब तक 2000 से अधिक ऑटिज्म प्रभावित बच्चों का मूल्यांकन किया जा चुका है. इनमें से लगभग 80 प्रतिशत बच्चों में एक या अधिक सहयोगी बीमारियां (comorbidities) पाई गई हैं, जैसे मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहार संबंधी समस्याएं और नींद के विकार. ये समस्याएं न केवल बच्चे के विकास को प्रभावित करती हैं, बल्कि उनके माता-पिता और परिवार पर भी भारी मानसिक और भावनात्मक बोझ डालती हैं.

ये हैं बच्चों के लक्षण

  1. . छोटो बच्चों का किसी बात पर ध्यान न देना
    . नाम पुकारे जाने पर प्रतिक्रिया न देना
  2. . भाषा विकास में देरी
  3. . अकेले रहना
  4. . एक ही व्यवहार को बार-बार दोहराना (हैंड फ्लैपिंग)
  5. . और खिलौनों के साथ अजीब तरह से खेलना
  6. . आई कॉन्टैक्ट न बनाना

इस दौरान बताया गया कि प्रारंभिक पहचान, समय पर हस्तक्षेप, परिवार-केंद्रित देखभाल और बहु-विषयक उपचार से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है. इस दौरान पैरासिटामोल, टीकों और ल्यूकोवोरिन जैसी उभरती उपचार पद्धतियों से जुड़े मिथकों और वास्तविकता पर भी प्रकाश डाला गया.

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प्रिया गौतमSenior Correspondent

Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें

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