Explainer: अल-नीनो क्या मुसीबत है, कब-कब भारत में इसने मचाया तांडव? अब बनने जा रहा सबसे बड़ा खतरा

What is El nino: मौसम वैज्ञानिकों की ओर से लगातार भारत पर नई मुसीबत अल-नीनो के आने की चेतावनी दी जा रही है. विज्ञानियों का कहना है कि मॉनसून में कम बारिश और मौसमी बदलावों का असर सबसे ज्यादा धरती और खेत-खलिहानों पर पड़ने जा रहा है. भीषण गर्मी, चक्रवाती तूफानों को लपेटकर अपने साथ लाने वाला अल-नीनो आखिर है क्या और क्या यह मुसीबत पहली बार भारत पर आ रही है या इससे पहले भी यहां आ चुकी है, आइए आज आपको इसके बारे में सबकुछ बताते हैं.

जब अल नीनो सक्रिय हो जाता है, तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ जाता है. बारिश औसत से 10-20% कम हो सकती है, सूखा और अकाल पड़ता है, गर्मी का भीषण प्रकोप बढ़ जाता है और फसलों को भारी नुकसान होता है. जबकि अल नीना इसका ठीक उल्टा होता है, जिसमें बारिश ज्यादा होती है.

अगर बात करें इस मुसीबत की तो 1950 से अब तक भारत में 16 बार एल नीनो आया है, जिनमें से 5-6 बार यह मजबूत या बहुत मजबूत रहा है और इसका बेहद खराब असर पड़ा है. इससे खरीफ फसलें बर्बाद हुईं और 6-8 महीने बाद बाजार में चावल, बाजरा, गन्ना, कपास और मूंगफली जैसी फसलों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं.

आइए जानते हैं कब कब आया अल नीनो?

1950-1970 के दशक में शुरुआती झटके
1950 के बाद का पहला उल्लेखनीय अल-नीनो 1957-58 में आया, जो मध्यम श्रेणी का था. इसके बाद 1965-66 और 1972 में स्ट्रॉंग अल नीनो ने तबाही मचाई. 1972 का एल नीनो बेहद खतरनाक रहा. मानसून में 24% की भारी कमी दर्ज की गई. देश में भयंकर सूखा पड़ा, खाद्यान्न उत्पादन में 10-15% की गिरावट आई. चावल और बाजरा की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं, लाखों किसान प्रभावित हुए और खाद्य सुरक्षा पर संकट गहराया. इस दौरान गन्ना और कपास की पैदावार भी घटी, जिससे अगले साल चीनी और कपड़ा उद्योग पर दबाव बढ़ा.

1980 का दशक में तेज झटके
1982-83 और 1987-88 में फिर स्ट्रॉंग एल नीनो देखा गया. 1982 में मानसून 14-16% कम रहा. 1987 में स्थिति और खराब थी. कई राज्यों में सूखे की स्थिति बनी. महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित रहे. चावल की खेती वाले क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ. मूंगफली और कपास की फसलें सूखे से जल गईं. इन वर्षों में किसानों की आय घटी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई.

1990 का दशक: जब आया सुपर एल नीनो

1997-98 का अल नीनो अब तक का सबसे मजबूत माना जाता है. दुनिया भर में इसने तबाही मचाई, लेकिन भारत भाग्यशाली रहा. सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के कारण मानसून सामान्य (102%) रहा. हालांकि कुछ क्षेत्रों में अनियमित बारिश हुई. इस बार फसलों पर सीधा बुरा असर नहीं पड़ा, लेकिन गर्मी बढ़ गई और पानी की कमी महसूस हुई.

2000 के बाद फिर बढ़ी चुनौतियां
2002 में मध्यम-मजबूत अल नीनो ने मानसून को 19% कम कर दिया. खाद्यान्न उत्पादन में 18% (लगभग 38 मिलियन टन) की भारी गिरावट आई. कृषि जीडीपी 7% घटी, जिससे अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ. चावल, ज्वार-बाजरा और मूंगफली बुरी तरह प्रभावित हुए.

  • 2009 में फिर स्ट्रॉंग एल नीनो आया मानसून काफी कमजोर रहा. हालांकि कृषि क्षेत्र ने कुछ हद तक तकनीकी प्रगति से सामना किया, लेकिन कई राज्यों में सूखा पड़ा.
  • 2015-16 सुपर एल नीनो का दौर था. मानसून 14% कम रहा. चेन्नई में भारी बारिश (नॉर्थ-ईस्ट मानसून प्रभावित) हुई, लेकिन कई खरीफ फसलें प्रभावित रहीं. कपास और गन्ना की पैदावार घट गई.
  • 2023-24 में भी एल नीनो सक्रिय रहा, जिससे कुछ क्षेत्रों में अनियमित बारिश और गर्मी बढ़ी, हालांकि बहुत बुरा असर नहीं पड़ा.

एल नीनो का सबसे बुरा असर किन चीजों पर पड़ता है?

  1. चावल: खरीफ की मुख्य फसल. पानी की कमी से पैदावार 10-30% तक गिर सकती है.
  2. मिलेट्स (बाजरा, ज्वार): सूखा सहन करने वाले माने जाते हैं, लेकिन गंभीर एल नीनो में ये भी प्रभावित होते हैं.
  3. गन्ना: लंबी अवधि की फसल, पानी की कमी से चीनी रिकवरी घटती है.
  4. कपास: वर्षा पर निर्भर, कम बारिश से कीट और सूखे का खतरा बढ़ता है.
  5. मूंगफली: तिलहन फसल, मिट्टी की नमी कम होने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित.

इन फसलों के नुकसान से 6 महीने बाद बाजार में कीमतें बढ़ती हैं क्योंकि भंडारण कम हो जाता है और नई फसल आने में समय लगता है. इससे मुद्रास्फीति बढ़ती है, गरीब और मध्यम वर्ग प्रभावित होता है.

बिजली की मांग और कीमतें करती हैं परेशान
अल नीनो न सिर्फ फसलों पर असर डालता है, बल्कि ग्रामीण आय, पशुधन, भूजल, बिजली मांग और समग्र जीडीपी पर भी दबाव डालता है. 50% से ज्यादा खेती बारिश पर निर्भर होने से छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं.

1950 से 2025 तक के 16 अल नीनो वर्षों ने भारत को बार-बार चेतावनी दी है. इस बार भी ऐसी ही चेतावनी मौसम विज्ञानियों की ओर से दी जा रही है. आज हम बेहतर मौसम पूर्वानुमान, सूखा-प्रतिरोधी बीज, फसल बीमा और सिंचाई सुविधाओं से तैयार हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ एल नीनो की तीव्रता भी बढ़ रही है.

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