OMG! इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं, बस हाथों का हुनर, दिल्ली के टूटू धवन कबाड़ वाली गाड़ियों को बना देते हैं शाही कार, जानें कैसे

नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी झेलकर दिल्ली पहुंचे टूटू धवन ने जिंदगी को वहीं से नहीं, बल्कि शून्य से शुरू किया. बिना किसी इंजीनियरिंग डिग्री के उन्होंने ऑटोमोबाइल की दुनिया में ऐसा नाम बनाया, जिसे आज विंटेज कार प्रेमी सम्मान से लेते हैं. उनके पास 70 से 100 साल पुरानी लग्जरी विंटेज गाड़ियों का दुर्लभ कलेक्शन है, लेकिन खास बात सिर्फ कलेक्शन नहीं, बल्कि उन गाड़ियों को अपने हाथों से दोबारा जिंदा कर देने की कला है. जंग खाई और कबाड़ हो चुकी कारों को नई जान देने वाले टूटू धवन की कहानी सिर्फ मशीनों की नहीं, जज्बे, हुनर और इतिहास से जुड़ी एक प्रेरक दास्तान है.

टूटू धवन ने बताया कि उनके पास कोई इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं है. ना ही, उन्होंने कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. स्कूल के बाद बीए किया, वह भी हिस्ट्री ऑनर्स में, लेकिन स्कूल के वक्त से ही उन्होंने ऑटोमोबाइल सेक्टर में जाकर काम सीखना शुरू कर दिया था. 7 से 8 घंटे तक बिना घड़ी देखे वह काम करते थे. गाड़ियों को बनाना या उन्हें संवारने का काम किया. उन्होंने कहा कि काम डिग्री नहीं, बल्कि हुनर पर निर्भर करता है. उन्होंने इतना काम किया अपने बचपन में ही इस क्षेत्र में की बिना इंजीनियरिंग के ही वह गाड़ियों को नया रूप देने के साथ ही नई गाड़ी तक बना लेते हैं.

ऐसे शुरू हुआ सफर

टूटू धवन ने बताया कि वह सिर्फ 7 दिन के थे. जब भारत पाकिस्तान के बंटवारे की आग सुलग रही थी. लाहौर स्थित उनके घर पर हमला हुआ था. पिता उन्हें और उनकी मां को लेकर दिल्ली आ गए. पिता स्पोर्ट्समैन थे और क्लब 77 नाम से उन्होंने कई लोगों को इसमें जोड़ रखा था. उनके पिता ने कई रिफ्यूजी को यहां बसाया. दिल्ली आकर नेशनल स्टेडियम के लिए उनके पिता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की थी. तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल स्टेडियम बनाने के लिए पीएम फंड से 10 लाख रुपए दिए थे.

उनके पिता ने रेलवे से डेढ़ साल तक छुट्टी ले रखी थी, बिना किसी पेमेंट के. ताकि नेशनल स्टेडियम बन जाए और यहां गेम्स हो सके. उन्होंने बताया कि उनकी मां डबल एमए कर रखी थी इसलिए चाहती थी कि बच्चे भी पढ़ाई लिखाई में अच्छे हों. उन्होंने स्कूल के साथ बीए हिस्ट्री ऑनर्स में किया और इसके साथ-साथ बिना बताए गाड़ियों को बनाना, गाड़ियों को देखना और गाड़ियों को सीखने का काम करने लगे थे. आज लगभग 50 साल का अनुभव उन्हें ऑटोमोबाइल सेक्टर में हो चुका है.

80 से लेकर 100 साल पुरानी गाड़ियां हैं मौजूद

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश निवासी टूटू धवन ने बताया कि उनके पास 60, 80, 90 से लेकर 100 साल पुरानी गाड़ियां तक मौजूद हैं, जो उस वक्त की लक्जरी गाड़ियां मानी जाती थी, जिसमें वोक्सवैगन माइक्रोबस 1970 है, जिसकी आज वैल्यू 70 से लेकर 80 लाख रुपए में है. इसके अलावा ड्यूक कार 1946, 1957 की जगुआर दुनिया की सबसे दुर्लभ और कीमती विंटेज स्पोर्ट्स कारों में से एक है, वो भी यहां पर है. मर्सिडीज-बेंज W108 1965 से 1972 के बीच निर्मित एक प्रतिष्ठित लग्जरी सेडान भी इनके पास मौजूद है.

इसके अलावा 1962 की फोर्ड मस्टैंग एक क्रांतिकारी टू-सीटर मिड-इंजन कॉन्सेप्ट कार थी, जिसे अक्टूबर 1962 में लॉन्च किया गया था. यह भी इनके पास मौजूद है. एमजी स्पोर्ट्स कार से लेकर  फिएट कार 1952 की भी उनके पास है जो उनकी पहली कार हुआ करती थी.

इस तरह मिलती हैं विंटेज कार

टूटू धवन ने बताया कि जब विंटेज कार को बनाने और संवारने का काम उन्होंने शुरू किया था. तब देश के कोने-कोने से जिन लोगों के पास विंटेज कार थी. वह ट्रेन या फिर सड़क के जरिए उनके पास कार को मॉडिफाई के लिए भेजते थे. इसी तरह उनका नाम ऑटोमोबाइल सेक्टर में बन गया. आज भी देश के कोने-कोने से विंटेज कार उनके पास आती हैं और गाड़ियों के जितने भी पार्ट्स होते हैं. उसे वह खुद ही बनाते हैं. उन्होंने बताया कि पहले वह इसे बिजनेस के तौर पर नहीं चलाते थे, लेकिन अब यही उनका बिजनेस बन गया है. अगर कोई सीखना चाहे तो उसे नि:शुल्क वह इसकी ट्रेनिंग देना चाहते हैं, ताकि उनके जाने के बाद भी यह काम कभी बंद ना हो.

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