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दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस में फिजिक्स की रिसर्च टीम ने एक ऐसी तकनीक पर काम किया है, जो बेकार हो रही मैकेनिकल एनर्जी को बिजली में बदल सकती है. इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने लोगों की बॉडी मूवमेंट, चलने-फिरने और सड़क की वाइब्रेशन जैसी ऊर्जा को उपयोगी बिजली में बदलने की दिशा में काम किया है. रिसर्च टीम ने इसके लिए लीड-फ्री K&N मटेरियल और पॉलिमर शीट्स को मिलाकर एक खास कंपोजिट तैयार किया है.
नई दिल्ली: दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस की फिजिक्स रिसर्च टीम ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित करने पर काम किया है, जो बेकार हो रही मैकेनिकल एनर्जी को बिजली में बदल सकती है. इस रिसर्च का उद्देश्य लोगों के चलने-फिरने, शरीर की हलचल और सड़क पर होने वाली कंपन जैसी ऊर्जा को उपयोगी बिजली में बदलना है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है. रिसर्च टीम ने इसके लिए लीड-फ्री K&N मटेरियल और पॉलिमर शीट्स को मिलाकर एक खास तरह का कंपोजिट तैयार किया है. इस तकनीक की मदद से छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और सेंसर को चार्ज किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर इससे सीमित मात्रा में बिजली उत्पादन भी संभव है.
क्या हैं एनर्जी हार्वेस्टर्स
रिसर्च टीम के अनुसार यह तकनीक ‘एनर्जी हार्वेस्टर्स’ के सिद्धांत पर काम करती है. यानी ऐसी डिवाइस जो आसपास बर्बाद हो रही ऊर्जा को इकट्ठा करके उसे बिजली में बदल देती हैं. प्रोफेसर मोनिका तोमर ने बताया कि फिलहाल ये डिवाइस बहुत ज्यादा बिजली पैदा नहीं करतीं, लेकिन छोटे उपकरणों और सेंसर को चलाने के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो यह भविष्य में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है.
क्यों खास है यह तकनीक
इस रिसर्च की सबसे खास बात यह है कि इसमें इस्तेमाल किया गया K&N मटेरियल पूरी तरह लीड-फ्री है. अभी तक इस क्षेत्र में PZT नाम के मटेरियल का इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन उसमें लेड होने के कारण उसे पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता. इसी वजह से वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं. रिसर्च टीम ने K&N आधारित पायजोइलेक्ट्रिक शीट्स तैयार कर इसी दिशा में एक नया विकल्प पेश किया है.
ग्रामीण इलाकों में भी हो सकता है इस्तेमाल
प्रोफेसर मोनिका ने बताया कि इस तकनीक का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में भी किया जा सकता है. गांवों में लोगों और जानवरों की आवाजाही से पैदा होने वाली ऊर्जा को बिजली में बदला जा सकता है. इससे छोटे स्तर पर बिजली उत्पादन संभव होगा और ऊर्जा की कमी वाले इलाकों को राहत मिल सकती है.
2021 से शुरू हुई थी रिसर्च
इस प्रोजेक्ट पर करीब पांच साल तक लगातार काम किया गया. रिसर्च टीम के मुताबिक इसकी शुरुआत साल 2021 में हुई थी और अब यह प्रोजेक्ट काफी एडवांस स्टेज तक पहुंच चुका है. इस विषय पर एक पीएचडी छात्र अपनी थीसिस भी जमा कर चुका है. टीम का कहना है कि अगर इंडस्ट्री का सहयोग मिले तो इस तकनीक को कमर्शियल स्तर तक ले जाया जा सकता है.
इंडस्ट्री सपोर्ट सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि लैब से तकनीक को बाजार तक पहुंचाने में सबसे बड़ी चुनौती इंडस्ट्री सपोर्ट की है. उनका मानना है कि अगर उद्योग जगत इस दिशा में निवेश करे तो यह तकनीक बड़े स्तर पर इस्तेमाल की जा सकती है.
युवाओं को दिया रिसर्च में आने का संदेश
रिसर्च टीम ने युवाओं से भी विज्ञान और रिसर्च के क्षेत्र में आगे आने की अपील की है. उनका कहना है कि देश की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए विज्ञान के क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं और युवाओं को समर्पण के साथ रिसर्च करनी चाहिए.
भविष्य में बदल सकती है ऊर्जा की तस्वीर
वैज्ञानिकों का मानना है कि शरीर की हलचल और सड़क की कंपन से बिजली बनाना पूरी तरह संभव है. आने वाले समय में यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा उत्पादन का बड़ा माध्यम बन सकती है और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में नई दिशा दे सकती है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें
