पीजी के 6 महीने बाद भी नहीं मिली नौकरी, आज जाने-माने ऑर्थोपेडिक सर्जन, मोटिवेट करती है डॉ. पुनीत मिश्रा की कहानी

दिल्ली. हर सफलता के पीछे एक कहानी होती है और हर कहानी में संघर्ष छिपा होता है. ऐसी ही कहानी है डॉ. पुनीत मिश्रा की, जो आज एक सफल ऑर्थोपेडिक सर्जन और यूनिट हेड के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं. डॉ. पुनीत मिश्रा बताते हैं कि उनकी मेडिकल यात्रा की शुरुआत साल 1991 में हुई, जब स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद करियर चुनने का समय आया.

उनके पिता खुद एक ऑर्थोपेडिक सर्जन थे, इसलिए बचपन से ही घर का माहौल मेडिकल लाइन से जुड़ा रहा. अपने पिता को ऑपरेशन करते देख उनके मन में भी एक सर्जन बनने की इच्छा पैदा हुई. उन्हें लगा कि सर्जरी ऐसा क्षेत्र है, जहां डॉक्टर मरीज की जिंदगी में तुरंत बदलाव ला सकता है और यही संतुष्टि उन्हें इस पेशे की ओर खींच लाई.

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में चयन बना पहला बड़ा पड़ाव
मेडिकल क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा पास कर प्रतिष्ठित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया. यह उनके लिए बेहद खास पल था, क्योंकि उनके पिता भी इसी कॉलेज से पढ़े थे. हालांकि, एमबीबीएस की पढ़ाई आसान नहीं थी. लगातार मेहनत, लंबे अध्ययन घंटे और प्रतियोगिता के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य पर फोकस बनाए रखा. एमबीबीएस पूरा करने के बाद उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन में ऑर्थोपेडिक्स को चुना और उसी कॉलेज में चयनित होकर अपने सपने को आगे बढ़ाया.

सरकारी अस्पताल ने सिखाया जिंदगी का असली मतलब
डॉ. मिश्रा बताते हैं कि जब उन्होंने ऑर्थोपेडिक विभाग में मरीजों का इलाज शुरू किया, तो सच्चाई उनकी कल्पना से बिल्कुल अलग थी. सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़, गंभीर हालत में आने वाले मरीज और सीमित संसाधनों के बीच काम करना आसान नहीं था. लेकिन यहीं उन्होंने मरीजों का दर्द करीब से महसूस किया. मरीज डॉक्टर को भगवान की तरह देखते थे और यही भावना उन्हें बेहतर डॉक्टर बनने की प्रेरणा देती रही. उन्होंने बताया कि सिर्फ डिग्री काफी नहीं होती, बल्कि मरीजों के प्रति संवेदनशीलता और समर्पण ही डॉक्टर की असली पहचान बनाते हैं.

छह महीने तक नहीं मिली नौकरी
पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्हें भी संघर्ष का सामना करना पड़ा. डॉ. मिश्रा बताते हैं कि देश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के बावजूद छह महीने तक उन्हें नौकरी नहीं मिली. यह समय उनके लिए चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. लगातार इंटरव्यू दिए और आखिरकार उन्हें सीनियर रेजिडेंसी का मौका मिला. इसी दौरान उन्होंने ट्रॉमा और फ्रैक्चर केसों में काम करना शुरू किया, जहां मरीजों की तेजी से रिकवरी देखकर उनका झुकाव हिप और पेल्विस फ्रैक्चर सर्जरी की ओर बढ़ा.

स्विट्जरलैंड की ट्रेनिंग ने बदल दी जिंदगी
डॉ. मिश्रा के करियर का सबसे बड़ा मोड़ साल 2003 में आया, जब उन्हें स्विट्जरलैंड जाने का मौका मिला. वहां उन्होंने मशहूर हिप विशेषज्ञ प्रोफेसर गैंज से तीन महीने की विशेष ट्रेनिंग ली. यह अनुभव उनके लिए जिंदगी बदल देने वाला साबित हुआ. हिप सर्जरी और ऑर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में उनकी समझ और तकनीकी कौशल में बड़ा बदलाव आया. वह मानते हैं कि इस ट्रेनिंग ने उनके सर्जिकल कॉन्सेप्ट को एक नई दिशा दी.

सरकारी सेवा से फोर्टिस तक का सफर
भारत लौटने के बाद डॉ. पुनीत ने सरकारी अस्पतालों में सेवाएं दीं, जहां बड़ी संख्या में मरीजों के इलाज ने उनके अनुभव को और मजबूत बनाया. साल 2006 से 2018 तक उन्होंने सरकारी मेडिकल संस्थानों में फैकल्टी के रूप में काम किया और धीरे-धीरे असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफेसर तक का सफर तय किया. इसके बाद साल 2018 में उनके जीवन ने फिर करवट ली और उन्होंने फोर्टिस हॉस्पिटल शालीमार बाग जॉइन किया. आज वह यहां ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डायरेक्टर और यूनिट हेड के रूप में कार्यरत हैं और पिछले करीब आठ वर्षों से मरीजों की सेवा कर रहे हैं.

परिवार का साथ बना सबसे बड़ी ताकत
डॉ. पुनीत मिश्रा मानते हैं कि उनके इस सफर में परिवार की भूमिका बेहद अहम रही. पत्नी, बच्चों और पूरे परिवार ने हर मुश्किल दौर में उनका साथ दिया. उनके अनुसार, परिवार का समर्थन किसी भी व्यक्ति की सफलता में सबसे बड़ी ताकत होता है. जब यहां से सुकून मिलता है तो इंसान बाकी क्षेत्रों में एक्सेल कर पाता है.

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