अरबों की जमीन, VIP मेंबरशिप और सीक्रेट नियम… आखिर क्या है दिल्ली जिमखाना क्लब का सच? तस्वीरों में देखें

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अरबों की जमीन, VIP मेंबरशिप और सीक्रेट नियम… क्या है जिमखाना क्लब का सच?

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Delhi Gymkhana Club Inside Pics: एक सदी से भी ज्यादा समय से दिल्ली जिमखाना क्लब भारत के सबसे खास सामाजिक संस्थानों में से एक रहा है. सफदरजंग रोड के पास हरे-भरे लॉन और पुरानी शैली की वास्तुकला के बीच छिपा यह क्लब, लंबे समय से राजधानी में रसूख और खास पहुंच का प्रतीक रहा है. अब, 113 साल बाद, केंद्र सरकार के बेदखली के आदेश के बाद यह संस्थान एक बार फिर सुर्खियों में है. चलिये देखें इस आलीशान क्लब के अंदर की तस्वीरें…

दिल्ली के लुटियंस जोन में फैला 113 साल पुराना दिल्ली जिमखाना क्लब एक बार फिर सुर्खियों में है. केंद्र सरकार ने क्लब को 5 जून तक 27.3 एकड़ की जमीन खाली करने का आदेश दिया है. सरकार का कहना है कि यह जमीन राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा ढांचे से जुड़े अहम कामों के लिए चाहिए. हालांकि क्लब ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका है.

हालांकि इस पूरे विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस ‘एलीट कल्चर’ की हो रही है, जिसके लिए दिल्ली जिमखाना क्लब जाना जाता है. ब्रिटिश दौर में बना यह क्लब लंबे समय से सत्ता, नौकरशाही और बड़े रसूखदार लोगों का गढ़ माना जाता रहा है. आम आदमी के लिए यहां सदस्यता हासिल करना लगभग नामुमकिन जैसा माना जाता है.

क्लब की सदस्यता व्यवस्था बेहद सीमित और विवादित मानी जाती है. यहां मेंबरशिप का पूरा सिस्टम कोटे में बंटा हुआ है. करीब 40 फीसदी सीटें नौकरशाहों और सिविल सर्विस अधिकारियों के लिए आरक्षित रहती हैं, जबकि 40 फीसदी हिस्सा सेना से जुड़े अधिकारियों के लिए होता है. सिर्फ 20 फीसदी जगह ही कारोबारी, निजी क्षेत्र के लोगों और अन्य आवेदकों के लिए बचती है.

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सिर्फ कोटा ही नहीं, सदस्यता पाने की कीमत भी इतनी ज्यादा है कि आम आदमी इसके बारे में सोच भी नहीं सकता. गैर-सरकारी आवेदकों को वेटिंग लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए ही 7 लाख रुपये से ज्यादा की नॉन-रिफंडेबल राशि जमा करनी पड़ती है. वहीं स्थायी सदस्यता शुल्क सरकारी अधिकारियों के लिए करीब 4.5 लाख रुपये और निजी आवेदकों के लिए 18 लाख रुपये से ज्यादा बताया जाता है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि पैसा होने के बावजूद सदस्यता मिलना तय नहीं माना जाता. क्लब में सीटें बेहद धीरे-धीरे खाली होती हैं और कई लोगों को 37 से 40 साल तक इंतजार करना पड़ा है. बताया जाता है कि कुछ लोगों ने 1970 के दशक में आवेदन किया था और उन्हें दशकों बाद सदस्यता मिली.

क्लब में एंट्री से पहले आवेदकों को एक खास सामाजिक प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ता है, जिसे ‘एट होम गैदरिंग’ कहा जाता है. यह एक तरह का निजी सामाजिक इंटरव्यू होता है, जिसमें देखा जाता है कि आवेदक क्लब की संस्कृति और तौर-तरीकों में फिट बैठता है या नहीं.

सरकार की नजरें क्लब पर तब और सख्त हुईं, जब कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की जांच में कथित भाई-भतीजावाद, वित्तीय गड़बड़ियों और नियमों से हटकर सदस्यता देने के आरोप सामने आए. इसके बाद सरकार ने क्लब की जनरल कमेटी को भंग कर दिया था.

अब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए क्लब को जमीन खाली करने का नोटिस दिया है. हालांकि क्लब के सदस्य इसे ऐतिहासिक विरासत पर चोट बता रहे हैं और कानूनी लड़ाई की तैयारी में जुटे हैं.

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