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Noida News: नोएडा में एक ऐसा मामला सामने आया है जो यह दिखाता है कि आज भी देश में सिविल मामलों का विवाद दशकों तक कैसे लटका रहता है. नोएडा में एक प्लाट पर सिविल जज द्वारा स्थायी रोक लगा दी गई थी, लेकिन 40 साल बाद याची को हक नहीं मिला है.
नोएडा अथॉरिटी की आपत्तियों से 40 साल भी प्लाट पर डिक्री का अमल नहीं
नोएडा. नोएडा के एक प्लॉट पर 40 साल पहले सिविल जज द्वारा स्थायी रोक का आदेश दिए जाने के बावजूद, अब भी उसका अमल नहीं हो सका है. याचिकाकर्ता के बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में पहुंचकर इस लंबित मामले की शिकायत की. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच ने याचिकाकर्ता की परेशानी को समझा, लेकिन कहा कि इस मामले में जल्द सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ही जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा, “हम इस तरह की याचिका पर सीधे सुनवाई नहीं कर सकते. आपको हाईकोर्ट में जाकर एक्जीक्यूशन की कार्यवाही जल्द पूरा करने की मांग करनी चाहिए.”
‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला 1987 में शुरू हुआ था. याचिकाकर्ता जयचंद के दिवंगत पिता ने नोएडा के एक प्लॉट पर स्थायी रोक लगाने के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था. सितंबर 1988 में सिविल जज ने उनके पक्ष में फैसला सुना दिया. नोएडा अथॉरिटी ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन दोनों जगहों पर उसकी अपील खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 1997 में फैसले पर अंतिम मुहर लगा दी.
नोएडा अथॉरिटी की आपत्तियों से लटका मामला
जिसके बाद 1997 में याचिकाकर्ता ने इस डिक्री को अमल में लाने के लिए आवेदन किया. लेकिन नोएडा अथॉरिटी ने एक के बाद एक आपत्तियां लगाईं, जिन्हें अदालतों ने बार-बार खारिज किया. परेशान होकर याचिकाकर्ता ने 2000 में हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की और अथॉरिटी द्वारा प्लॉट पर किये गए निर्माण को गिराने की मांग की. 2003 में उन्होंने डिक्री की जल्द अमल की मांग की. 2006 में हाईकोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी की कार्यशैली पर नाराजगी जताई और कहा कि एक्जीक्यूशन आवेदन पर रोजाना सुनवाई हो और कहा कि किसी भी स्टे की अनुमति न दी जाए.
अभी भी लंबित है मामला
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि डिक्री अंतिम हो चुकी है और हाईकोर्ट ने भी जल्द सुनवाई का आदेश दिया था, फिर भी आज तक अमल नहीं हुआ है. इससे याचिकाकर्ता को अपने प्लॉट का अधिकार मिलने से रोका जा रहा है. यह मामला साबित करता है कि देश में सिविल मुकदमों में फैसला आने के बाद भी कितनी मुश्किलें आती हैं.
